शनिवार, 9 जनवरी 2010

अपनी बोली अपनी भाषा


बहुत दिन से सोचा की एक ब्लॉग अपनी भाषा मैं लिखूं , मगर वहां भी संकट , मेरी अपनी भाषा कौन है  हिंदी या मैथिली 

आप कहोगे वो कैसे ?
अपनी भाषा तो हिंदी है ...................नहीं रे कहानी इतनी आसान नहीं है रे बौआ ... मैथिली की संस्कृति और इतिहास कहीं अधिक सात्विक और प्रमाणिक है . इतनी सुन्दर और मधुर बोली शायद ही कहीं मिले . और रही सही बात बचपन से बोलता आया हूँ तो अपनापन यहीं से आता है ..
दूसरी तरफ हिंदी है जो अपना सा लगता है जब से आया हूँ दूर देश ... हर हिंदी भाषी लगता है घर का है ..
तो भाई मैंने सोच ली , मैं ब्लॉग दोनों  भाषा में लिखूंगा .. आखिर अपना ब्लॉग है कंजूसी कैसी ?
लेकिन दिक्कत आती है लिखने में , ये पढाई लिखी ने कहीं का नहीं छोरा .. इंग्लिश आती नहीं अच्छे से और हिंदी भूल गया हूँ . कभी कभी डर  लगता है की कहीं देवनागरी न भूल जाऊं , सबकुछ तो रोमन में होने लगा है . हिंदी भी लिखता हूँ तो इंग्लिश में .. कमाल है ना...
अच्छी और शुद्ध  हिंदी बोलो  तो लोग वेवकूफ समझते हैं, तो कहाँ से आएगी हिंदी ... शुद्ध हिंदी का प्रयोग तो अब बस  सरकारी कार्यालयों के विशेष सप्ताओं के लिए बनकर रह गया है मगर फिर भी हम हिंदी हीं बोलेंगे  वो भी बिहारी हिंदी  . हम कहते हैं क्यों ना बोले जब सामने वाले को आसानी ने समझ में आये तो . कई बार तो ये हम भी हमें  मुश्किल में डाल  देती है पता नहीं सही है या गलत मगर हम तो हम ही बोलते हैं भाई .
दूसरी बात है दू(२) और छ  (६).ये तो हमसे नहीं छुटने वाली है अब दो तो मान लूं की सही हैं मगर ये छे (६) कैसे सही है?
शुद्द तो छः है कोई बोलता क्यों नहीं ?
तीसरी चीज है ठो और गो .......... दू ठो और तीन गो , चार ठो और पांच गो ........................
एक और बात नाम के आगे वा और माँ .. सचिन तेंदुलकर भी हो जाता है अपने लिए सचिनवा .. धोनी बन गया धोनियाँ .  राहुलवा और गंगुलिया. कभी ना भूलने वाली अपनी भाषा अपनी बोली .......... आगे भी लिखता रहूँगा

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