गुरुवार, 21 जून 2012

कृषण की चेतावनी !!

~ : रामधारी सिंह दिनकर

वर्षों   तक   वन   में   घूम   घूम
बाधा  विघ्नों  को  चूम  चूम
सह  धुप  ग़म  पानी  पत्थर
पांडव  आये  कुछ  और  निखर
सौभाग्य  ना  सब  दिन  सोता  है
देखे  आगे  क्या  होता  है
मैत्री  की  राह  दिखने  को
सब  को  सुमार्ग  पे  लाने  को
दुर्योधन  को समझाने  को
भीषण  विध्वंस   बचाने  को
भगवन  हस्तिनापुर  आये
पन्द्दाव  का  संदेसा  लाये
दो  न्याय   अगर  तो  आधा दो
पर  इसमें  भी  यदि  बाधा  हो
तो  दे दो  केवल  पांच   ग्राम
रखो  अपनी  धरती  तमाम
हम  वाही  ख़ुशी  से  खायेंगे
परिजन  पे  असि ना  उठाएंगे 
दुर्योधन  वोह  भी  दे  ना  सका
आशीष  समाज  की  ले  ना  सका
उलटे  हरि  को  बांधने  चला
जो  था  असाध्य  साधने  चला
जब  नाश  मनुज  पर   छटा  है
पहले  विवेक  मर  जाता  है
हरि  ने  भीषण  हुंकार  किया
अपना  स्वरुप  विस्तार  किया
डगमग  डगमग   दिग्गज  डोले
भगवन  कुपित  होकर  बोले
जंजीर  बाधा  अब  साध  मुझे
हां  हां  दुर्योधन  बाँध  मुझे
यह  देख  गगन  मुझमे  ले  है
यह  देख  पवन  मुझमे  ले  है
मुझमे  विलीन  झंकार  सकल
मुझमे  ले  है  संसार  सकल
अमरत्व  फूलता   है  मुझमे
संहार  झूलता  है  मुझमे
उदयाचल  मेरे  दीप्त  भाल
भू -मंडल  वक्ष -स्थल  विशाल
भुज  परिधि  बांध  को  घेरे  हैं
मैनाक  मेरु  पग  मेरे  हैं
दिपते  जो  गृह  नक्षत्र  निकर
सब  हैं  मेरे  मुख  के  अन्दर
दृग हो  तो  दृश्य  अकाण्ड  देख
मुझमे  सारा  ब्रह्माण्ड  देख
चर -अचर    जीव , जग  क्षर  अक्षर
नश्वर  मनुष्य , सुर जाती   अमर
सत्   कोटि  सूर्य , सत्  कोटि  चन्द्र
सत्  कोटि  सरित , सर सिन्धु  मंडरा
सत्  कोटि  ब्रह्मा  विष्णु  महेश
सत्  कोटि  जल पति  जिष्णु  धनेश
सत्  कोटि  रूद्र , सत्  कोटि  काल
सत्  कोटि  दंड   धर  लोकपाल
जंजीर  बाधा  कर  साध  इन्हें
हाँ  हाँ  दुर्योधन  बाँध  इन्हें
भूतल   अताल   पातळ  देख
गत  और  अनागत  काल  देख
यह  देख  जगत  का  आदि  सृजन
यह  देख  महाभारत  का   रन
मृतकों  से  पति  हुई  भू  है
पहचान  कहाँ  इसमें  तू  है ?
अम्बर  का  कुंतल  जाल  देख
पद  के  निचे  पाताल   देख
मुट्ठी  में  तीनो  काल  देख
मेरा  स्वरुप  विकराल  देख
सब  जन्म   मुझी  से  पाते  हैं
फिर  लौट  मुझी  में  आते  हैं
जिह्वा  से  काढती  ज्वाल  सघन
साँसों  से  पाटा  जन्म  पवन
पर  जाती  मेरी  दृष्टि  जिधर
हंसने  लगती  है  सृष्टि  उधर
मैं  जभी  मूंदता  हूँ  लोचन
छा  जाता  चारो  और  मरण
बाँधने  मुझे  तो  आया  है
जंजीर  बड़ी  क्या  लाया  है ?
यदि  मुझे  बांधना  चाहे  मनन
पहले  तू  बाँध  अनंत  गगन
सुने  को   साध  ना  सकता  है
वो  मुझे  बाँध  कब  सकता  है ?
हित  वचन  नहीं  तुने  माना
मैत्री  का  मूल्य  ना  पहचाना
तो  ले  अब  मैं  भी   जाता   हूँ
अंतिम  संकल्प  सुनाता  हूँ
याचना  नहीं  अब  रण  होगा
जीवन  जय  या   की  मरण  होगा
टकरायेंगे  नक्षत्र  निकर
बरसेगी  भू  पर   वह्नी  प्रखर
फन  शेषनाग  का  डोलेगा
विकराल  काल  मुंह  खोलेगा
दुर्योधन  रण  ऐसा  होगा
फिर  कभी  नहीं  जैसा  होगा
भाई  पर  भाई  टूटेंगे
विष -बाण  बूँद -से  चुतेंगे
सौभाग्य  मनुज  के  फूटेंगे
वायस  शृगाल   सुख  लूटेंगे
आखिर  तू  भूशायी  होगा
हिंसा  का  पर्दायी  होगा
थी  सभा  सन्न , सब  लोग  डरे
चुप  थे  या  थे  बेहोश  पड़े
केवल  दो  नर  ना  अघाते   थे
ध्रिश्त्राष्ट्र -विदुर  सुख  पाते  थे
कर  जोड़  खरे  प्रमुदित  निर्भय
दोनों  पुकारते  थे  जय -जय ..

रविवार, 29 अप्रैल 2012

कुछ बातें खेती बारी की :)

कृषि प्रधान ईस देश में कभी हम भी खेती किया करते थे ! बात उन दिनों की है , जम हमारी उम्र कुछ १०-१२ साल की रही होगी . 
दादा की नौकरी शुरू हो गयी थी मगर मूलतः वो एक किसान ही थे . गाँव का कोई मजदूर तैयार होता नहीं था उनके साथ कदम से कदम मिलकर काम  करने को :) ! हमारे यहाँ एक हरवाहा रहा करते थे , मुखर पासवान ! अपनी बैलों की जोड़ी थी , एक शुद्दा दूसरा मरखाह , हाँ खाने देते वक़्त कभी नहीं मरता था . बहुत साडी भैसें आई , गायें आई मगर ये दोनों कमसकम १० साल हमारे यहाँ रहे थे . खैर बात हो रही थी खेती की .
पूरी खेती बैलों से ही होती थी उन दिनों , ट्रक्टर नया नया ही आया था और सिमित था .
सुबह सुबह मुखर बैलों को ले किसी न किसी खेत में , और उसके जलपान का जिम्मा रहता था हम लोगों का .
एक बड़ी सी मक्के की रोटी , कुछ सब्जी और आचार , साथ में पानी से भरा हूया ढोल . 
लौटे हुए नहाते थे बोरिंग पर , और हाथ में रहता था एक बड़ी सी ईख का डंडा . 


उन दिनों हसनपुर चीनी मिल में जाया करता था ईख , हर खेती करने वाले के यहाँ से १ ट्रक , हमरे घर से ४-५ ट्रक जाता था , लोग बस चारे के लिए  मुफ्त में ही  काटकर लाद देते थे ट्रक पे सारी की सारी ईख . आज तो हर काम के लिए मजदूर चाहिए .
हमारा कम होता था उनकी रखाबरी करना , जबतक ट्रक ना आये लेने . वैसे ईख रोपने में भी हम जाते थे और टोनी गिराते थे नालों मैं .
मकई की फसल में हमारा बहुत योगदान होता था , दिवाली और छठ की बचाई हुयी फटाकों के साथ , ताकि चिड़ियाँ कही खा न जाये नयी नयी कोपलों को . फिर मकई की फसल को पानी की बहुत जरुरत , ३-४ पानी तो लगेगा ही .
बोरिंग का रेट थे उन दिनों , ३० रुपया घंटा , एक घंटे मैं २-३ कता पटता था . पानी का नाला अगर टूट जाये तो आधा पानी दूसरों के खेत मैं.

चने और मटर की हरी फसल पे निगाहें रहती थी , की कब दाना हो और हम ओढ़ा भून भून कर खाएं .
हरे चने का भूना ओढ़ा और नाले के कबाई  और सिंघी माछ , सीधी आग पे भूनी हूई , शायद एस जनम में दुबारा ना मिले .
फसल कट के आती थी खलिहान में . १६ भोझा पे एक भोझा मजदूर का मगर हां मजदूर वाला भोझा स्पेशल होता था , लगता था सारा गाँव उमर पड़ता था . गेहूं के लिए थ्रेशेर आता था भाड़े पे और मकई के लिए ट्रेलर . मगर दलहन तो जिम्मा होता था बैलों का , नीचे रखकर गोल गोल घूमते थे (डाऊन)दिन भर बैल और हम , तब जा के फिर उसे ओसाना ( हवा के साथ गिरना , ताकि अनाज/दल और भूसा अलग लग गिरे ) . इतनी धुल ध्हक्कर पर आजतक किसी को अस्थमा और कोई बीमारी नहीं सुनी . इतनी मेहनत के बाद सीधे चापाकल में मुह लगाकर बालू वाला पानी पीना . 
कहानी यहीं नहीं ख़तम होती है , अनाज को सुखाना और कोठी में रखना भी रहता था , धुप निकले तो छत पे चढ़ाना और शाम को समेटना . घर के छत में बनाया हुआ छेद , गिराने के काम आता था .

वक़्त बहुत बदल गया है , डिजेल दिया करता था उन दिनों १० रुपया लीटर और गेहूं  होता था ८ रुपया किलो .
आज डिजेल हो गया है ४५ रुपया मगर गेहूं बिकता है १० रुपया किलो . हाय रे किसान !
और भी बहुत सी बातें होती थी , अब तो भूल भी गया हूँ क्योंकि अब नहीं होती हैं वो बातें गाँव में भी .

गुरुवार, 8 मार्च 2012

अपनी होली !!


बुरा न मानो भाई  होली है   ,

आज होली है , और बाकि  दिनों  की तरह उठा, तैयार हुआ  और ऑफिस की तरफ चल दिया ! पुरे यकीं के साथ के कोई एक टीका भी नहीं लगने वाला ! सब कुछ वैसे का वैसा , trafiic  में सरकता हुआ शहर ,भागते हुए लोग ,मैं भी उनमे से एक  अपनी कुछ यादों के साथ ! ये अनमोल यादें शायद जिसे सोचकर ये कह सकूं की भाई होली तो हम खेलते थे .

हमारे गाँव में होली एक दिन का नहीं महीने भर का त्यौहार होता था ! था क्यों , क्योंकि अब वहां भी एक ही दिन का होने लगा है  ! माघ का महीना आते ही , बसंत पंचमी के साथ फगुआ का असर दीखता था  ! कहानी शुरू होती थी होलिका दहन के लिए जुगाड़ से , अलग किसम का पहिया वाला गाड़ी बनाते थे जंगले उघने के लिए ! खेत ओगारने वाले झोपरी पे अलग से ध्यान रहता था ! हर बार अपना रिकॉर्ड सुधारना रहता था ! सिर्फ  पांच ही , अरे हम तो सात लाये थे बोले भैरो काका अकेले , लानत है आजकल के लडको पे .
फिर सम्मत(होलिका दहन ) के चारो तरफ जोगीरा गाते हुए घूमना और आग को तेज करना भी डंडे से हम लोगो का मेन काम होता था .

अगला दिन होली , कितना इंतजाम करना है , सरलका मोबिल , हरियरका आ ललका रंग  , बांस वाला पिचकारी, अबीर  सब लाना हैं . और स्पेशल बात भांग और माजूम वो अलग से , भांग बहुत देरी से चढ़ता है सो भोरे भोर खाना होता था . पता करना की सबसे बढ़िया खस्सी कौन काट रहा है , खिजा वाला उसी से लेना है मांस .

ये सब करते करते बजे १० , तब तक एक राउंड पूआ और खीर के साथ ललका रंग पोता जाता था , उजरका खीर आधा लाल हो लिया साथ में मानो वो भी खेल लिया होली .
चोरा के एक भांग की गोली भी लगा ली ,फिर निकल पड़े सबको पोतने , लाल हरा और काला रंग . गाँव के कुटुम सब के लिए स्पेशल इंतजाम रहता था , सरलका मोबिल और जरलका डीजल और हरा रंग .

२ बजते बजते रंग वाला हुडदंग ख़तम और , मुँह धो धा के अबीर वाला होली होता था , सभी बड़े लोगों के पैर पे अबीर रखकर आशीर्वाद लेना और हमउम्र को तो बस पोत देना .
३ बजे जोगीरा आता था , हनुमान मंदिर से चलकर दुआरे दुआरे कीर्तन करते हुए . सभी दुआरे पे भांग और ठंडे शरबत होते थे ! पीओ और आगे बढे
गीत वही गाते हुए  :
   "सदा आनंद रहे ओये पारे , रघुवर खेले होली हो "
   "इक दिस खेले कुवर कन्हिया , इक दिस राधा जोड़ी हो "

कुछ दूर पे जोगीरा होता था , एक अलग तरह का लोक संगीत "
" सा रा रा सा रा रा रा रा, रा रा रा रा रा रा रा रा  रा रा "
"  जोगी जी सा रा रा रा रा , जोगी जी रा रा रा रा रा रा रा " 
" कल कल कलकते मैं काली मैया , काली मैया के चढ़े दूध बताशा "
" कोई नाचे, कोई गावे , कोई देख तमाशा , बोलो सा रा रा रा रा रा रा रा "


और फिर उसका जवाब कोई देता था , ये सिलसिला शाम तक चलता रहता था .

अब चारो तरफ दिख रहा है भंग का असर , लोग अनायास हँसे जा रहे हैं , कोई किसी से सिर्फ बहस ही किये जा रहा है . कोई खाये जा रहा है , असल में भांग कमाल करता है , लोगों की क्षमता कई गुना बड़ा कर देता है .

बस कोई खाने को दे दे , वो भी खस्सी ,उपर से दिन भर की खुमारी , भांग का असर क्या खाया कितना खाया , ये बस माएं ही जानती हैं , पहली बार खाने को लेकर कोई शिकवा नहीं रहता है उस दिन !

अपनी होली तो इसी तरह होती थी , सुनते हैं गाँव भी बदल गया है , अब नहीं होते  कीर्तन जोगीरा  वहां भी ! कुछ बीअर और रम मिल जातें हैं गाँव में हीँ, लोग अपनी दुश्मनी निकलते है इस दिन . कुछ लड़के अब भी दीखते हैं सडको पे , मगर उल्टियाँ करते हुए , क्या करें मॉडर्न और अमीर जो हो गए हैं .

अपनी इन्हीं यादों के सहारे हम काल्पनिक होली खेलकर खुश हैं और कहते हैं क्या करें जमाना बदल गया है .
  
 
  
 

शनिवार, 3 मार्च 2012

गावँ आ गाछी !!



गाछी : आम का बगीचा , खांटी मैथिलि शब्द है
कौसानी : कच्चे आम का  mixed  आचार (paste)
मधुश्रावनी : मधुमास : स्पेशल महीना ,नव विवाहित युवतियों का
घोरान : लाल चीटीं , जो पेड़ पे रहती है .


बात बहुत पुरानी है , मैं शायद आठ दस साल का रहा हूँगा , होली की खुमारी ख़तम होते ही मौसम आता था महुआ का साथ में आम का मंजर , कुछ अलग ही माहौल रहता था गाछी का .


गेहुम की फसल कट के सजी है खलिहान में , और आ गया वक़्त महुआ का . महुआ का फूल सुबह सुबह चुनना . पांच टोकरी में एक चुनने वाले को , और सूरज निकलने से पहले सारा महुआ बड़े से छिट्टा में .
आजतक नहीं समझ पाया करते क्या थे उस महुए का , घर आ के उसे सुखाना फिर बोरी में भर के रखना . शायद ४-५ रुपया किलो बिकता था सुखा महुआ , कहते हैं शराब बनाने वाले ले जाते थे , पर हमें क्या १००-१५० रूपये मिलते थे हमें महीने भर की मेहनत के बाद उसका का भी तीन चार हिस्सा हम भईयों में .

खैर लौटते हैं हम गाछी की तरफ , महुआ के बाद आता था टिकला का समय , किसन भोग और बम्बई तो शायद ही बच पाता था हमारी शातिर नज़रों से , रोज नए नए तरीके टिकला तोरने के , गाछी मालिक परेशां, रखबार के रहने पर भी नहीं बच पाते थे ये टिकोले . वैसे हम सब आम को बराबर निगाह से देखते थे , आखिर टिकोला टिकोला ही है ,हाँ बीजू आम के टिकोले का कौसानी और कल्कतियाँ का आचार का जबाब नहीं , मई आते आते हमारे घरों में काफी आचार और कसौनी हो जाती थी , नहीं तो बाकि कोर कसर खटहा आम से निकल जाता था .

फिर पकना शुरू होता था बम्बई , सबसे पहले , मधुश्रावनी के साथ ही , नयी नहीं गाँव की  दुल्हन लड़कियां फूल चुनने गीत गाते हुए जाती है    अपनी सखियों के संग और हम अपनी मेहनत निकालते थे बम्बई पर , आधे आम तो गाछी मैं जमीन के नीचे पकने के लिए रख देते थे और भूल जाते थे , १० दिन बाद याद आने पर मिलती थी बस अंठी .

जून आते आते बम्बई साफ़ , लेकिन असली कहानी तो अभी बाकि है , बीजू पकने के साथ आती थी बहार गाछी में . मचान और चौकी लग जाती थी गछियों में , आखिर राखबारी जो करनी है . भाई गछ्पकू आमो का अपना अलग ही मजा है . बरका गाछी में लगते थे चार चौकी , शोभा मालिक का मचान , अर्जुन दादा का मचान , मणि काका , और बाला काका सभी तैनात . रात भर टोर्च की रोशनी जगमगाती रहती थी . पता नहीं कहाँ चले जाते है भुत प्रेत उन महीनो में , साल के बाकि दिनों में तो सात बजे के बाद हिम्मत नहीं होती थी आने की .

सुबह सुबह पके आमो के साथ लौटने का अपना अलग ही आनंद होता था . फिर दिन भर आना जाना लगा रहता था गाछी का . पका आम लुटने का अलग ही competition  होता था .
 अब इन सब में जामुन की बात न करें तो ज्यादती होगी , मजे की बात ये थी की जामुन सार्वजनिक होता था , पेड़ किसी का भी हो , इनपे सब का हक , जो जामुन तोडा , उसका  जामुन . बस पेड़ पे चढ़ना ही बहुत बड़ी बात थी , घोरान का दर , टुनुक डाल जामुन की , कई बार तो में अपनी हड्डी तोडा .

गाछी की ये बहार रहती थी ,जुलाई अंत तक . फिर आम , जामुन सभी ख़तम, और हम सिमट जाते थे अपने घरों में बारिस की बूंदों के साथ अगले साल के इंतजार में !!


सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

यादें अपने बचपन की



 


बात सन 1987  की है , भाई उससे पहले की बातें  नहीं हमें . हमरा स्कूल हूआ करता था करियन मध्य विद्यालय , मैं शायद स्कूल जाना शुरू किया था , सारी तैयारी थी अपने तरफ से , अ आ से य , र , ल व् और दूंका से बीस तरीक  का खांत रता हुआ  था . मरसेब को कोई गुन्जईयेस नहीं थी .

सुबह हुआ , ज्यादा  समय तो कुआ पे नहाया , कुएं का ठन्डे पानी का कोई सनी नहीं ,कभी पोखरी मे भी नहाते थे दादी के संग घंटो . पता नहीं कब हेलना-तैरना सीख गए थे। अब तालाब का गन्दा पानी देखता हूँ तो यकीन नहीं होता है कि कभी हम यहाँ घंटो रहते थे बिना बीमार हुए ,ननिगावं में नदी जाते थे नानी के संग ,रास्ते में परवल के खेत और बालू ही बालू ,साफ़ होने के बदले और गंदे हो के लौटते थे घर ,
बातें हो रही थी स्कूल कि , स्कूल जाने की तैयारी , बोरा प्लास्टिक वाला  खाद वाला ,,,,,सेमेंट वाला छोटा था , अटते नहीं दू गोटा . पांचवां क्लास से मिलता था बेंच डेस्क उससे पहले तक बच्चा क्लास बोरा वाला ,,,, सेलेट और पेंसिल झोरा में रखा और चलो जल्दी नहीं तो पार्थना छूट जायेगा और मार लगेगी सो अलग से  . चप्पल भुला  जाता था स्कूल में ........  तो ले जाना ही  छोर दिया .

स्कूल का भी सीधा नियम था , पार्थना और फिर बैठ जाओ , झोरा खोलो , सेलेट निकालो और जो आता है सब लिख के मरसेब को दिखा आओ  मरसेब कभी कभी ही गलती पकरते थे . गलती होने पे आती थी बुझावन सिंह की बारी (मरसेब की छड़ी )
 5 मिनट माने पेशाब करने जाना , और १० मिनट माने २ नंबर इतना हमें पता चल गया था .वैसे १० मिनट मांगकर जाते थे इमली तोरने  उतरबारी टोल और फिर पेंसिल के बदले मैं इमली , हां कभी कभी छिना जाता था , किसी के कोम्प्लैन पर .
टिफिन में घर जा के खाना  और फेर दोसरा बेरियाँ , यहाँ  तो  मजा आता था , एक ही घंटा बाद  होता था ,,,,,,,, गिनती और फेर  कबड्डी ... ४ बजे छुट्टी और फिर से घर.

घर मतलब गाछी और यहाँ वहाँ जाने कहाँ , बस अँधेरा होते होते घर आ जाना वरना कोई मदद नहीं करेगा दादी के सिवा , लालटेन कि रौशनी मे हिंदी किताब जोर जोर से पढ़ना 8 बजे तक ,,,फिर बोरिया बिस्तर समेटे और खाने चल दो ,
गर्मी के महीने में खुले छत पे सोने का आनंद AC में भी नहीं मिलेगा ,और जाड़े का वो सजोट (एक स्पेशल बिस्तर जो पुआल से बनता था ,चौकी को खड़ा किया जाता है ताकि ओस न आये ,फ़ोटो )

इन सारे बातों के बीच बस इतना ध्यान रहे कि क्लास में स्थान हमेशा पहला या दूसरा रहे , नहीं तो सब गड़बड़

बहुत सी बातें लिखनी हैं आगे और  लिखूंगा  ..........!!

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

कशमकश

दो शक्श है अपने अंदर ,इक वो जो देहात में पला है , वहीँ की मिटटी में खेला है , खुश होता है गाँव की बातें देखकर सुनकर !  इक जो देखा है  शहर को , बड़ी बड़ी किताबें खोलकर ये समझ लिया की यही है असली दुनिया , भाग रहा है दिन रात ये सोचकर की उसे शूकुं मिल जायेगा .  कहाँ जायेगा कुछ पता नहीं बस चले जाओ किसी अनजान साये के पीछे . मगर क्या करें देहात भी बदल गया है ,लोग बदल गए हैं . नए नए यंत्रों ने उन्हें भी दिखा दी है नयी दुनिया .  वहां भी शुरू हो गयी है चूहों वाली दौर . पहले इंजिनियर होना बड़ी बात होती थी , भला हो  नए नए कालेज का , कुछ नहीं तो इंजिनियर तो बन ही जायेगा . शुकून वहां भी नहीं हैं

अक्सर सोचता हूँ मतलब क्या हैं ये सब भागमभाग की तो किसी भद्रजन ने कहा , की जीवन स्तर का सुधार करना ही मुख्या धेय्ये हैं कमाने धमाने का . कुछ देर तो समझा , मगर क्या पैमाना हैं जीवन स्तर मापने का यही पता नहीं . क्या भौतिक सुखो का साधन ही है वो इंडेक्स . शायद नहीं  !!  खुश रहने को ग़ालिब ख्याल अछ्हा है