गाछी : आम का बगीचा , खांटी मैथिलि शब्द है
कौसानी : कच्चे आम का mixed आचार (paste)
मधुश्रावनी : मधुमास : स्पेशल महीना ,नव विवाहित युवतियों का
घोरान : लाल चीटीं , जो पेड़ पे रहती है .
बात बहुत पुरानी है , मैं शायद आठ दस साल का रहा हूँगा , होली की खुमारी ख़तम होते ही मौसम आता था महुआ का साथ में आम का मंजर , कुछ अलग ही माहौल रहता था गाछी का .
गेहुम की फसल कट के सजी है खलिहान में , और आ गया वक़्त महुआ का . महुआ का फूल सुबह सुबह चुनना . पांच टोकरी में एक चुनने वाले को , और सूरज निकलने से पहले सारा महुआ बड़े से छिट्टा में .
आजतक नहीं समझ पाया करते क्या थे उस महुए का , घर आ के उसे सुखाना फिर बोरी में भर के रखना . शायद ४-५ रुपया किलो बिकता था सुखा महुआ , कहते हैं शराब बनाने वाले ले जाते थे , पर हमें क्या १००-१५० रूपये मिलते थे हमें महीने भर की मेहनत के बाद उसका का भी तीन चार हिस्सा हम भईयों में .
खैर लौटते हैं हम गाछी की तरफ , महुआ के बाद आता था टिकला का समय , किसन भोग और बम्बई तो शायद ही बच पाता था हमारी शातिर नज़रों से , रोज नए नए तरीके टिकला तोरने के , गाछी मालिक परेशां, रखबार के रहने पर भी नहीं बच पाते थे ये टिकोले . वैसे हम सब आम को बराबर निगाह से देखते थे , आखिर टिकोला टिकोला ही है ,हाँ बीजू आम के टिकोले का कौसानी और कल्कतियाँ का आचार का जबाब नहीं , मई आते आते हमारे घरों में काफी आचार और कसौनी हो जाती थी , नहीं तो बाकि कोर कसर खटहा आम से निकल जाता था .
फिर पकना शुरू होता था बम्बई , सबसे पहले , मधुश्रावनी के साथ ही , नयी नहीं गाँव की दुल्हन लड़कियां फूल चुनने गीत गाते हुए जाती है अपनी सखियों के संग और हम अपनी मेहनत निकालते थे बम्बई पर , आधे आम तो गाछी मैं जमीन के नीचे पकने के लिए रख देते थे और भूल जाते थे , १० दिन बाद याद आने पर मिलती थी बस अंठी .
जून आते आते बम्बई साफ़ , लेकिन असली कहानी तो अभी बाकि है , बीजू पकने के साथ आती थी बहार गाछी में . मचान और चौकी लग जाती थी गछियों में , आखिर राखबारी जो करनी है . भाई गछ्पकू आमो का अपना अलग ही मजा है . बरका गाछी में लगते थे चार चौकी , शोभा मालिक का मचान , अर्जुन दादा का मचान , मणि काका , और बाला काका सभी तैनात . रात भर टोर्च की रोशनी जगमगाती रहती थी . पता नहीं कहाँ चले जाते है भुत प्रेत उन महीनो में , साल के बाकि दिनों में तो सात बजे के बाद हिम्मत नहीं होती थी आने की .
सुबह सुबह पके आमो के साथ लौटने का अपना अलग ही आनंद होता था . फिर दिन भर आना जाना लगा रहता था गाछी का . पका आम लुटने का अलग ही competition होता था .
अब इन सब में जामुन की बात न करें तो ज्यादती होगी , मजे की बात ये थी की जामुन सार्वजनिक होता था , पेड़ किसी का भी हो , इनपे सब का हक , जो जामुन तोडा , उसका जामुन . बस पेड़ पे चढ़ना ही बहुत बड़ी बात थी , घोरान का दर , टुनुक डाल जामुन की , कई बार तो में अपनी हड्डी तोडा .
गाछी की ये बहार रहती थी ,जुलाई अंत तक . फिर आम , जामुन सभी ख़तम, और हम सिमट जाते थे अपने घरों में बारिस की बूंदों के साथ अगले साल के इंतजार में !!
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