शनिवार, 23 मई 2015

अपनी भाषा

कहते हैं भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है ... नए ज़माने की नौकरियां ,नए ज़माने के कपडे ,नए ज़माने के खाने सब कुछ एक दम अलग जो हमारे बाप दादा किया करते थे ..बात कुछ हद तक सही भी है बीसवीं सदी की बातें शायद अब  वक़्त के साथ जंचेगी
कुछ बातें वक़्त के साथ बदली जैसे अचानक से भारतीय कपड़ो साडी और धोती का गायब हो जाना ,ये सभी सभ्यताओं के साथ हुआ, चीन और मिश्र के लोग तो एक सदी पहले ही अपने मूल भूत कपडे त्याग के यूरोपियन अपना बैठे , स्कॉटलैंड की पहचान स्कर्ट और जापान का ओरिजिनल ड्रेस अब शायद ही कभी दिखे ,कुछ मध्य पूर्व के इस्लामिक देशों के अलावा पूरा विश्व शायद अब इस मामले में एक ही है ।।
दूसरी बात  टेक्नोलॉजी का उपयोग ,कम से कम इलीट वर्ग शायद वैश्विक हो गया है अपवाद के तौर पे बस कुछ पिछड़े मुल्क ही होंगे और वो भी वहां के अशिक्षित लोग जो की हालात अपने यहाँ भी हैं । दूर गावँ में अभी भी इंटरनेट और स्मार्टफोन शायद ही कोई जनता होगा लेकिन हालात तेज़ी से बदल रहा है और एक दो दसक में शायद सब कुछ बदल जाये ।

तीसरी बात जो की तेज़ी से बदल रही वो बढ़ता  मिडिल क्लास लोग और ये लोग बड़े ही खास सोच वाले होते हैं ये ही जो किसी समाज का व्यापक रूप से निर्माण के उत्तरदायी होते हैं .लेकिन कभी कभी इनकी सोच बड़ी ही संकीर्ण होती है उदहारण के लिए भाषा का उपयोग ,इन्हे  लगता है की मातृ भाषा के उपयोग करने से वे छोटे हो जायेंगे और नीचे हो जायेंगे
ये निम्न मानसिकता हमें अभी भी आगे नहीं बढ़ने दे रही
कई भाषाएँ लुप्त हो रही और अपना वजूद खो रही है
शायद हम इस मामले में दूसरे बिकसित देशों से पीछे रह गए। जर्मनी जापान कोरिया और चीन ने दिखा दिया की आगे बढ़ने के लिए भाषा मायने नहीं रखती ।सवाल ये नहीं है की आप दूसरी भाषा  ना जाने सवाल ये है की आप अपनी ना भूलें । अपने आसपास देखता हूँ बच्चे और उनके अभिवावक मातृभाषा बताना जरुरी नहीं समझते और वो बच्चा अपने ही घर में अजनबी की तरह रहता है ,तीन पीढियां तीन भाषाएँ बोल रही होती है ,दादा और दादी मातृभाषा ,माँ और बाप कोई बड़ी भाषा और बच्चा कोई विदेशी भाषा, और शायद अपने इस मिडिल क्लास को लगता है की चलो अपना पैसा जो बड़ी सी स्कूल में लगाया है वो काम  कर रहा है ,हाय रे समझ .....

रेलयात्रा

जब भी रेल यात्रा की बात होती है तो हमारा ख्याल तीन तरह की श्रेणी में आता है , अगर आपकी यात्रा बहूत कम समय के लिए हो और आप वास्तविक भारतीय रेल का आनंद लेना चाहते हो तो कृपया साधारण श्रेणी में जाएँ ,वैसे ये बहुत ही हिंम्मत की बात है लेकिन जो अनुभव् आपको मिलेगा वो  अद्भुत होगी
अगर आपकी यात्रा 24 घंटे से ज्यादा का है तो इक बार शयनयान स्लीपर का आनंद जरूर लें
सारी दूरियां और दायरे मिट जाते हैं कुछ ही घंटों में , जैसे जैसे हम क्लास बढ़ाते हैं हमारी दूरियां यूँ ही बढ़ती जाती है या यूँ कहिये की हम सिमटते जाते हैं अपनी दुनियां में, साधारण में घंटे दो घंटे में जान पहचान ,स्लीपर में 4 से 6 घंटे वहीँ 3ऎसी में शायद दिन र लगता है , 2 ऎसी ओर एयरलाइन में तो मैंने आज तक किसी को सहयात्री से बात करते भी नही देखी
अपनी अपनी स्मार्टफ़ोन और laptop में सिमटे लोग .
वर्चुअल दुनियां में हजारों से जुडो लेकिन जो वक़्त पे काम दे वो कोई नहीं

मैंने 6 साल बाद स्लीपर् की यात्रा की ,शुरुआत में थोडा सा अटपटा लगा लेकिन लोगो की बातें और अपनापन
सही लगा
बस भारतीय रेल कुछ सुविधायें अगर साधारण जनता को भी तो हमारा कर अदा करना सार्थक हो जाये

दिशा और दशा।

सामाजिक न्याय की जो बात आज हमारे कुछ तथाकाथित नेता गण कर रहे हैं शायद अब वो शून्य हो गयी है ।राजनीती जो कभी कुछ गिने चुनी लोगो की बपौती थी आज भी है बस इसका स्वरुप बदल गया है ,पहले अगड़े समुदाय के नेता और कुछ पिछड़े ... आज राजनिती पिछड़ी समुदाय करती है और कुछ अगड़े अपना वर्च्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं । अगर बिहार के परिपेक्ष्य में देखे तो समाजिक न्याय की जो लड़ाई जय प्रकाश नारायण ने जनेऊ तोड़कर शुरू की थी सही में वो लालू और नितीश युग में आकर सम्पन्न हुआ । इस लंबी लड़ाई में अगर किसी ने कुछ खोया यो वो बिहार और बिहारी जनता ।बिहार के अन्दर आवाज पाने की चाहत ने उन्हें सारी दुनिया के सामने मानो मुज़रिम बना दिया । उन्हें आज वहां वो हर समम्मान और इज्जत है जो किसी अगडी जाती की मानी जाती थी , सारी राजनीती पिछडो के बीच केंद्रित हो गयी है।
सामाजिक उथा पुथल में मानो बिहार वीरान हो गया ,जापान के बाद अगर कहीं जनसंख्या घटी है तो वो बिहार है ,चौकिये मत जनाब ,बिलकुल सही फारमाँ रहा हूँ l लोग तो बहुत बढे मगर वहां कोई नई रहता , पढ़ने लिखने की औकात रखने वाले लोग बहार हैं और जो मेहनत मजदूरी करने वाले वो भी । सिर्फ आवाज पाने से पेट नहीं भरता साहब ,आवाज तो मिल गयी मगर इस पापी पेट का क्या ऐसे तो अन्न चाहिये , बर्सो से दबे लोगों को जब पता चला की दुनिया बदल रही तो बदलती हवा भी उन्हें रोक न सकी और वो शायद ही भारत के किसी कोने में न हों।समाज का यह वर्ग अब अपने जगह पे आवाज पाकर भी नयी जगह पे बेगाना ही रहा
बिहार के गावो में सिर्फ बच्चे और बूढे रहते है ,जवान वही जिनके बहुत खेत है और एक डर है कोई हमारा जामीन न जोत ले ,10 गावँ को खिलाने में जीतना चावल आज से 20 साल पहले लगता था आज भी उतना ही लगता है , मतलब हम 1995 से आगे बढे ही नहीं  । इन्ही लोगो का प्रेम गाहे बगाहे छठ और होली में भारतीय रेल में उमड़ पड़ता है
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली खेती  बस सिमट के रह गयी ।खेत हैं लेकिन मजदूर ही नहीं आखिर पंजाब के मुकाबले की मजदूरी बिहारी किसान कहाँ से कर पाएंगे । मशीनीकरण अभी कोषों दूर है ,हार कर लोगों ने खेती करना ही कम कर दिया है
लेकिन विकास की चमक दूर दूर तक दिख रही है ,बाहर से भेजे पैसे से पक्के मकान  हर तरफ दिखेंगे रही सही कसर सरकारी स्कीमो से पूरी हो रही है । छठ और होली के अवसर पे कुछ हलचल हो जाती है और गावँ फिर सो जाता है अगले छठ के इंतज़ार में

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

कुछ कहानी MIT क़ी ....

इस कहानी के कोई भी सभी पात्र काल्पनिक नहीं हैं और सबका जीवित ब्यक्तियों के साथ सम्बंध हैं


ये कहानी शुरू होती है सन २००३ से ,
वैसे तो सारे कॉलेज कि एक ही कहानी होती है , लेकिन अपना बहुत ही स्पेशल था , सुनते  है अब बदल गया है।  सन 1955 से अपना सर उठाये हुए है मुजफ्फरपुर में , इतना बदनाम कि बस स्टेंड से कोई भी ऑटो वाला जाने को ना तैयार ,  बहुत ही बड़े बड़े अलुमिनी है , लेकिन लोकल लोगो के लिए इस कॉलेज में सिर्फ गुंडे और बदमाश बढ़ते हैँ , जो कि पूरी तरह से गलत है/ फिर ये बदनामी का दाग दामन पे क्यों ,बातें होंगी इस बारे में


एक बात जो पहले दिन सीखा , वो था phylum , ये एक शब्द जिसका मतलब इस तरह से है
"A large division of possibly genetically related families of languages or linguistic stocks"
अपने यहाँ इसका मतलब सीधा होता था कि भैया किस जात से हो , कोई हिचक नहीं खुलेआम , आधे तो सरनाम से पता चल जाता था बाकि का पूछ लिया जाता था , बताना ही पड़ता था और कोई भी चारा नहीं बचने का  ।  सारा तामझाम तो उसी से शुरू होना था  ये शब्द से सब कुछ तय होता था अगले चार पांच साल का
 सफ़र, पहली बार मैंने जाना की मेरे सरनेम और जाती का क्या रिश्ता है , कुछ कुछ ओवरलैपिंग होता था तो confusion होता था। कालेज में घुसते ही ग्रुप मिल जाता था और कहाँ अगला चार पांच साल गुजरना है , पहले से फिक्स , कौन से आपके दोस्त होंगे ये भी ऑलमोस्ट फिक्स।  अपना  वही हाल हुआ , पहुँचते ही सीनियर  ग्रुप मिल गया , कहाँ रहना है , क्या खाना है ,   बोलना है , नहीं बोलना है , सब उनके हिसाब से , बस जी में जी मिलाते  रहे ,

फेज : 1 : पहला
बात शुरू करते हैं पहले कुछ महीने  की, शायद ही दुनिया  के किसी जगह पे ेऐसा रैगिंग होता होगा।  एक बार ये क्लियर हो गया आप किस phylum से हो फिर शुरू होता था टॉर्चेर का दौड़। कुछ विशेष नियम होते थे।    …।   --जूनियर मुर्गो के लिए (स्पेशल नाम मुर्गा ,फच्चा ,फ्रेशेर )
-- सुबह 6 बजे बजे उठना ,पुरे फॉर्मल ड्रेस में दिन भर , रात के 11  तक
--- नज़र हमेशा थर्ड बटन पर और कॉलर हमेशा बंद
--कॉलेज में इन्सान क्या कुत्तों तक को wish करना , गुड मॉर्निंग ,गुड आफ्टरनून , गुड डे ऐसा आदत  पड़ा की आजतक किसी सीनियर को देखते निकल  जाता  है
-- एक स्पेशल नियम थी " Seniors are always right , if they are not please follow part one "
--Senior का बात नहीँ मानने का मतलब ,mutiny ,rabel और सजा यहाँ बयां नहीं कर सकता बस  समझ लीजिये की आधी जान निकाल देते थे
-- आप बड़े बाल नहीं रख सकते , अकेले बाहर नहीं जा सकते , मतलब  आप सोने , जांगने ,हसने,बोलने सब सीनियर्स decide करते  थे
--हर दिन लगता था की ये extreme है , इससे बढ़कर क्या हो सकता है लेकिन "Sky has no limit "
-- सीनियर रहने पे जूनियर के पैसे खर्च करने का सवाल ही नहीं , सुट्टा ,चाय तो नार्मल ,सिनेमा हॉल से लेकर बस टिकट तक देना होता था
--सीनियर के सारे जर्नल ,कॉपी टेस्ट्स नोट्स अच्छे राइटिंग वाले जूनियर करते थे

रैगिंग लेने का काम सिर्फ Immediate seniors का था , वो बाप होते थे , दादा  जी और बड़े दादा  जी बहुत कम वो भी एब्नार्मल केस में (pre final  year , final year seniors )
 रैगिंग ग्रुप और individual दोनों लेवल पे होते थे।
अगर कुछ स्पेशल skill , जैसे , गाना वगैरह हो तो थोड़ा बच सकते थे
Cigarettes ,शराब ये सब बहुत  नार्मल बात और मना करने का सवाल ही नहीं होता था

फेज 2 :

फिर आता था दौर फ्रेशेर पार्टी का , अपने यहाँ का रीत जरा सा निराला था , अब रैगिंग हुई phylam के हिसाब से तो पार्टी भी उसी तरह , शहर का कोई होटल बुक होता था , सारे immediate सीनियर्स चंदा करते थे ,और हमारा टाई को ढीला कर दिया जाता था उस दिन।  बहुत कुछ तो याद नहीं अलग से मिस्टर फ्रेशेर के सिवा लेकिन हाँ दारू बहुत पीना होता था,और जबरदस्ती का नाच गाना ,
भाई साब डांस भी अजीब , बस नौटंकी कह लो

और अब हम हो गए आजाद पंछी , लेकिन सीनियर इस ऑलवेज करेक्ट वाला बात जिंदगी भर के लिए हो जाती थी , गुड डे सर और गुड मॉर्निंग सर जैसे मानो जबान से चिपक जाती है


पढाई और परीक्षा !

उस दौर में कुछ अजीब से दास्तान हुए थे , बिहार यूनिवर्सिटी में था अपना कॉलेज , लालू का राज था , शिक्षा व्यवस्था की मनो बैंड बज गयी थी , हमारे कॉलेज में एक सिविल के अलावा सारे डिपार्टमेंट्स में टीचर ही नहीं ,सो कॉलेज बस टाइम पास होता था , बस कुछ टीचर अपने क्लासेज लेते थे और बच्चे भी नाम मात्र
  सारे परीक्षाएं कॉलेज में ही होती थी ,इंटरनल्स और यूनिवर्सिटी एग्जाम।  ये वो दौर था जब इयरली सिस्टम था और साल में दो इंटरनल्स एंड एक यूनिवर्सिटी पेपर्स होते थे।
एग्जाम का स्तर दिन बा दिन गिरता जा रहा था , कोई भी कॉलेज एग्जाम के लिए नहीं पढता था , GATE और  PSU का preparation करना मूख्य ध्येय था पढ़ने का

अजीब अजीब नुस्खे होते थे चीटिंग करने के , कहाँ से शुरू करूँ

पहले कहानी शुरू हुयी चिट पुर्जों से , थोड़ी से धाख थी शिक्षकों की , नज़र से बचा के कॉपी कर लिया , कभी सर ने अवॉयड किया तो कभी कुछ देर के लिए कॉपी ले ली।

फिर थोड़ी आगे बढ़ी ,माइक्रो (पूरी किताब का मिनी ज़ेरॉक्स ) छुपकर जाने लगा , अब शायद शिक्षक भी हर मान गए थे , लेकिन थोड़ी सी शर्म बाकि थी लड़कों में , बेचारे टीचर भी क्या करें क्लास भी तो शायद ही ले पाते  थे।

एक दो साल में मंजर बदल गया , सरे शर्म और  तेल लेने गयी , माइक्रो का खर्च भी ज्यादा लगने लगा और सब को सब कुछ पता ही है, पूरी की पूरी किताब जाने लगी , एग्जाम हॉल में , सवाल ये था की आंसर कहाँ और कैसे मिलेंगे , कितना लिखना है , कहाँ से कहाँ तक , पूरी एग्जाम रूम एक मछली बाजार हो जाता था , आधे घंटे के अंदर सरे स्टूडेंट्स इधेर से उधेर आपने अपने ग्रुप में,
अति तो तब हुयी जब कार्बन कॉपी तक आने लगी ताकि वक़्त बचाया जा सके ,एक सवाल मैं करूँ एक सवाल तू करे ,और फिर अदला बदली कॉपी कार्बन से
ये सब मुख्यतया फाइनल और प्रे फाइनल वाले करते थे , फर्स्ट और सेकंड ईयर वाले अभी भी डरते थे और थोड़ी सी पानी था उनकी आँखों में,
खैर ये सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला , यूनिवर्सिटी में पता चला , बिहार की सरकार बदली , एग्जाम इनटर्नल से एक्सटर्नल हुआ वो भी  यूनिवर्सिटी के कॉमन हॉल में अंडर रैपिड एक्शन फ़ोर्स और फिर क्या शमा था। .......... कल तक किताब खोल के नक़ल करने वाले अब सर तक नहीं हिला सकते थे, पाप का घड़ा शायद भर गया , बहुतों को बैक लगा , सबों ने पढ़ना और रटना  शुरू कर दिया , सिर्फ यूनिवर्सिटी क्लियर करना है भाई।
 जनबरी महीने में आता था GATE का result और कॉलेज के दीवारें रंग जाती थी पोस्टरों से .... congratulation वाले ... समझ में नहीं आता था ये सब पढ़ते कब थे यैसे हालत में   एक दो नहीं कई रैंक होल्डर खासकर civil mechanical और electrical  में  फिर किसी ने Psu  निकाल ली वो कहानी चलती रहती थी चाय सुट्टा वाले टपरे पर 
टपरे से याद आया ....वैसे वो  जगह होती थी जहाँ कॉलेज के सारे नियम कानून ताक पे रख दिए जाते सिवाय सीनियर junior के   .... सारे लोग एक ही suttta पीते थे बाँट बाँट के मानक्या  प्यार है इन
पूरी तरह से बलात्कार हो जाती थी बेचारी सुट्टे का ,सीधा नियम था जितना मुंडी उतनी चाय 


लड़की और कड़की 
पूरी तरह से लड़को के कालेज में नाम मात्र की लड़कियां भी पढ़ती थी उन दिनों ,वैसे phylum का कण्ट्रोल थोडा कम रहता था उनपे लेकिन फिर भी वो तो वहां की हवा में था देर सबेर आना ही था ,हाँ एक आधा rabel तो हो ही जाते थे 
किसी दूसरी phayle की लड़की को लाइन मारना भी अपराध था और बहुत ही हिम्मत की काम था ,खुलेआम दोस्त होना जुर्म था जब तक की मजबूरी न हो , कालेज के ज्यादातर झगडों के मूल कारन लड़की होती थी मगर ये बात उन्हें पता नहीं होती थी
उन दिनों लड़कियों का हॉस्टल नहीं था और वो दो स्पेशल जगह पे होती थी , white houce और pink houce ,नाम के पीछे की अलग कहानी थी ,लेकिन अच्छी लड़कियां पहले में रहा करती थी ,
लड़कियो के साथ घूमना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी और ये करना सब के बस की बात नहीं थी 
मेरे बैच तक जीन्स में आने की हिम्मत नहीं की लड़कियों ने ,बाद में बात सामान्य हो गयी

कड़की का दौर रहता था , सरकारी कॉलेज का फी तो कुछ नहीं था लेकिन ज्यादा लोग लोअर मिडिल क्लास से आते थे ,चाय सुट्टा और स्नैक्स का खर्च भी ग्रुप में डर ही लगता था की मेरे सर न आ जाय. जूनियर आने के बाद तो ये डर भी रहता था की पता नहीं किधर से वो आ टपके , कुछ लोग वहां के लोकल बच्चों को पढ़ाते थे कुछ पैसों के लिए..... हाँ अगर आप रिज़र्व से हो तो फिर मजे हैं आपके , फी माफ़ी के अलावा पैसे भी मिलते थे मटरगस्ती के लिये

लड़ाई और पढाई 
लड़ाई झगड़ो का दौर हमेशा रहता था , झगड़ों की कोई खास वजह नई होती थी , बस मौका चाइये हो स्टार्ट हो जाते थे , आपस में लड़ते थे और दूसरे कास्ट से तो लड़ते ही थे , कभी कभी ये झगड़ा मारने मारने तक जाती थी और कॉलेज अनिश्चितकालीन बंद 
बहार वाले से झगड़ा होने पे सब एक हो जाते थे लेकिन आगे उन्हें होना होता था जो की लड़ाई स्टार्ट करते थे 
हर किसी के पास अश्त्र और शस्त्र होता था ,हॉकी स्टिक, बेसबॉल बैट,लोहे की रोड,चैन देसी मेड कट्टा ये सब फेवरेट ,वैसे हमने हॉकी स्टिक और कुछ सड़े हुए देसी बम के अलावा कुछ प्रयोग होते नहीं देखा 

एक झगड़ा मुझे बहुत याद है जहाँ हमने बहुत मारा और शायद बहुत पिटाई खायी ,बिना जाने समझे जा भिड़े बस स्टैंड वालों से ,खैर बात बहुत नई बढ़ी और दो चार लोगों के सर पैर फूटे,थोड़ी सी नौटंकी और बचैनी के बाद मामला रफा दफा हो गया ,लेकिन लगता था दुनियां यही है और हम बस ये ही करने आये हैं

बात अगर पढाई की हो तो भी जबाब नहीं ,बिहार के टॉप लड़के आते थे जाहिर है सब अच्छे ही होते थे पढ़ने में ,आज अगर  नज़र घुमा के देखो तो एक आध को छोड़कर सब काफी सफल जिंदगी जी रहे हैं , कुछ बच्चे कॉलेज से ही जॉब ले लेते थे और कुछ कथवारिया जा के , मकसद सिर्फ PSU जॉब लेना होता था ,GATE में अच्छे रैंक और qualify भी अच्छे खासे होते थे ,खुद से पढ़ के इतना भी होना एक करिश्मा ही था , एक सिविल को छोड़कर लगभग सभी लोग खुद से ही पढ़ते थे , कॉलेज में उन दिनों कैंपस बिलकुल नहीं होता था सिर्फ टॉप पांच मेकैनिकल और एलेक्ट्रिक्ल को टाटा मोटर्स में चांस मिलता था , बाकि सब की जिंदगी में वही फाइट , पहले तो चार साल की पढाई पांच साल यहाँ ऊपर जॉब का भी लफड़ा ,फाइनल इयर तो यूँ ही निकल जाता था सबका

जिंदगी के ये चार पांच साल में शायद ही कुछ अच्छा किया हो लेकिन ये सबसे ज्यादा याद आने वाले पल हैं ,मुझे ये नहीं पता की एक इन्सान बनने में दुनिया को बेहतर जानने में ये साल कुछ मदद करता हो लेकिन ये वो मंज़र था जिसे याद करके एक अलग अहसास होता है . पूरी रात बैठ के कोई शराब पी सकता है ,पीने के बाद इतनी उलटी की अपने भी साथ छोड़ दें ,मगर वो कमबख्त दोस्त और पिलाते थे , फ़िर सुबह के चार बजे जा के बेरिया बस स्टैंड में चाय पीना , रोटी तंदूर (RT) जैसा चिकन और स्पंज कहीं नहीं मिला मुझे . संजय सिनेमा का बिना टिकट लिए मूवी देखना और भारत जलपान का डोसा | सारी दुनिया अपनी थी और लगता था हमसे ही जहाँ ,मन करता है हर वो चीजें करो जो करने नहीं आये हो तभी असली मज़ा है जीवन की 

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

कुछ सवालात उलझे से !!

बहुत सी बातें इन्सान के समझ से परे है , मैं यहाँ उन बातों को नहीं छेड़ रहा हूँ ! सवाल तो पहला यही है कि भाई मैं हूँ  कौन ,  क्या कर रहा हूँ इधर ,,,,,ये सब बड़ी बातें हैं , समझ में नहीं आनेवाली , और शायद समझने की हिम्मत भी नहीं , चलिए आते हैं साधारण बातों कि तरफ।

एक उलझन होती थी ,और अभी भी होती है कि आपके पसंद  क्या है ,इस सवाल पे,,, , ये तो मैंने कभी सोचा ही ही नहीं हमें एैसी कौन सी बात खास पसंद है , हर अच्छी चीज़ें हमें भी अच्छी लगती है ,और बुरी भी।
बचपन से जवानी आ गयी मगर ये समझ ना आयी , Engg के दिनों में सबका common होता था , क्रिकेट ,म्यूजिक ,और मूवी।  कुछ नया नहीं सब के सब के बराबर, कुछ अलग बोला तो हज़ार सवाल सीनियर के !
कभी कुछ अलग करता तब तो,,,, बस वही करता रहा जो सब कोइ करता है , बनी बनायीं लीक , तो ये शिगूफे किधर से आयेंगे , अभी भी बहुत क्लियर नहीं है ,लेकिन अब कुछ समझता हूँ कि क्या मुझे ख़ुशी देती है और क्या गम !

दूसरा सवाल जिसका जबाब नहीं वो जब लोग पूछते हैं , 5 -10 बाद कहाँ देखते हो अपने आप को , अच्छी बात है ,बहुत ही अच्छी बात है ,इन्सान को दूरदृस्टी होना चाइये ,इतिहास गवाह है ,जिन्होंने आगे देखा दुनियां उन्ही कि हुयी है ,मगर मै इस विषय में एकदम फेल कर जाता हूँ , ये भी नहीं पता अगले घंटे क्या होनेवाला है ,सालों का तो आईडिया भी नहीं है , बस अगर सब सही  रहा तो खाता , गाता और मुस्कुराता रहूँगा ,,,बाकि उपरवाले कि मर्ज़ी ..

तीसरा सवाल जिसका जबाब नहीँ पता वो शादी कब कर रहे हो ,,,, जबाब बस जब हो जाये , इतने पे एक और सवाल कैसी लड़की चहिये , पहले का तो जबाब दिया नहीं अच्छे से ,,,ये वाला तो बहुत ही मुश्किल है जनाब ,,,, अगर पता होता तो खोज न लेता खुद ,,, कमाल करते हैं साहब

अगला सवाल है कि कहाँ सेटल होना चाहते हो , किस शहर में , भाई एैसा है कि जहाँ दाना पानी मिलता रहे , अब कोई फिक्स्ड तो है नहीं जिंदगी कहाँ ले जाने वाली तो बस क्या इतराना , जिधर शाम वहीं ठिकाना

 आम आदमी वाली काशिश तो हर जगह है ,लेकिन अपना केस थोडा जटिल है, अब  सवाल ये है कि मैँ गावं का हूँ या शहर का , कोई जबाब नहीं , पला बढ़ा गावं में , काम धंधा इधर !
पुरातनपंधी हूँ या मॉडर्न , शायद वहाँ भी एक कश्मकश  है , पता ही नहीं  चलता, सबके साथ रह लेता हूँ , सबके बीच बस लेता हूँ और कहीं का हूँ भी नहीं।

हिंदी छूट गयी और अंग्रेजी कभी आयी नहीं ,,, वहाँ भी रामखुदैया ,,,,,
धार्मिक बन नहीं पाया , और अधर्मी और अविश्वासी भी नहीं ,,, हाँ दुःख के वक़्त भगवन जरुर य़ाद  आते हैं

कसमकस का ये शय. कही नहीं छोड़ा है , जहाँ काम करता हूँ वहाँ भी नहीं पता कि डेवलपमेंट में हूँ कि QA में , हमेशा श्थिति ये रहती है कि बोलूं क्या , ये तो कहीं का नहीं है



शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

यूँ हीं बीते कुछ साल !!

2003 से 2013 दस  साल यूँ ही बीत  गया , कभी कभी सोचता हूँ क्या खोया क्या पाया इन लमहात में। 
क्या कुछ बदला हमारे बीच , कौन जुदा हुए हमसे और कौन नए लोग आये हमारे दरम्यान 

सवाल बहुत हैं , बहुत सी बातें बदल गयी है  परिवार ,समाज और देश में , मैं वहीं का वहीँ अभी , फर्क ये है कि मेरे जेब में कुछ पैसे आते हैं बीते हुए महीने  के साथ , और हाँ मैँ 55 से 65 KG का हो गया इस दौरान , बाकि सब वही है , कुछ नए दोस्त मिले , कुछ उलझ गए अपनी माया मोह के बंधन में। 
दुनिया थोड़ी सी उलझी लगने लगी और लोग थोड़े मतलबी से 
वक़्त थोडा सा धीरे चलने लगा है और हम थोड़े से भटके से 

उलझन बढ़ गए हैं ,रिस्ते नातों के , ज्यादा जिम्मेदार होने का तमगा मिल गया , मगर अंदर से वही हैं जाहिल और गॅवार।  
दुनिया देखी , लोग देखे , सारा जहाँ देखा , एैसे ही हैं ,सब जगह।  पेरिस कि गलियों से चीन की मुहल्लों तक एक ही नज़ारा है ! संस्कृति बदल जाते है , भाषा बदल जाते हैं ,कपडे और रहन सहन बदल जाता है लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलती वो है भागमभाग! लोग कहीं के खुश नहीं अपनी जिंदगी से , बस चाहत है एक  उन्हें जिन्दा रखी है ,,,, शायद 
जिंदादिली बस थोड़े से लोगों के पास हैं , अपने आप पे हसने का जज्बा ,दुसरो को इक मुस्कुराहट देने की इक छोटी सी कशिश और हर पल को हसीं बनाने कि चाहत ! सुनने में बड़ा ही अजीब लगता  है लेकिन इतने मगन हो जाता हैं ये इन्सान कि पता ही नहीं चलता कि चल क्या रहा है अपने वजूद के साथ 
कभी   कभी यूँ  ही  ख्याल   आता  है  कि  कौन  सा  जज्बा  है  जो रखती  है  इन्सान  का  वजूद 
कि  जबकि  हमको  भी  पता  है  कि  कुछ  भी  नहीं  है  यहाँ  हमेशा  के  लिए  हर चीज़े  पुरानी होती  है ,वक़्त  के  साथ  बदलती  है !

एक  सोच  ही जो हमें अलग करती हैं  गैरों से चाहे वो इन्सान हो या जानवर , यही वो शय है जो सारे गम कि जननी है , ना सोचो और खुश रहो। सोच अच्छी या बुरी , माया को जनम देती है और माया ही तो वजह सारे दुखों की , चाहे वो भौतिक सुखों का हो या मानसिक आहतों का 
अगर एक बहती नदी के तरह सिर्फ लगे रहे अपने कामों में तब शायद सब सही रहे , गीता में भी कहा गया बस तू लगा रह बिना सोचे और फल कि आशा किये , लेकिन ये पापी इन्सान मानने वाला थोड़े ना है ,कर्म तो हम  करेंगे नहीं लेकिन फल हमे दिखना चाहिए ,मैं भी उनमे से इक हूँ ! एक एैसे राह पे चलते जाना है जिसका कोई मंजिल नहीं , बस बिना सोचे ,बिना जाने। ............................ 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

दूरदर्शन और हम !!




आज भले इंटरनेट LED/एलसीडी कितना इतरा लें। ..  दूरदर्शन और टेलिविशन  TV का बहुत जोर चला है 
बात उन दिनों की है , जब TV होना बहुत  ही बड़ी बात होती थी और सिर्फ गिने चुने लोगोँ के पास ये सौभाग्य होता था।  रंगीन को जाने  दें  जनाब , ब्लैक एंड वाइट TV होना भी बहुत बात होती थी , रंगीन TV तो बस  कुछ के पास होते थे वो भी शहरों में , लोग टीवी धार्मिक कार्यक्रम देखने  मीलों चले जाते थे। 

 दौर था लेट 80s का , रामायण और महाभारत आते थे TV पे , अपने  यहाँ दो चैनल आते थे एक दूरदर्शन और दूसरी नेपाल TV चैंनल। उस ज़माने में TV सिर्फ रामायण और महाभारत के  वजह से बिकते थे , कम से कम अपने गावं में  सारे TV सेट। 
टीवी का स्टैण्डर्ड साइज़ होता था १४ इन्च ,और बहुत सारी ताम झाम होते थे साथ में , ,ऐन्टेना ,बूस्टर दो दो , बैटरी १२ वोल्ट वाला  ,चार्जर।  बिजली होती ही बहुत कम थी तो बैटरी का सहारा रहता था। एंटीना घुमा के फ़ोटो सही कर देने पे वो प्राउड महसूस होता था जो आज शायद ही नसीब हो। 
 
इसी ज़माने  में आयी थी ,अपनी बुश टीवी , एकदम नयी नयी दुल्हन कि तरह ,सन 1987 -88 मे , रविवार दिन १० बजे आता था महाभारत इंडिया से और शनिवार रात ९ बजे रामायण नेपाल  से।  कम से कम १००-150 लोग आते थे देखने। टीवी बाहर  निकलती थी कम से कम 10 मिनट पहले ,बैटरी के क्लिप से कार्बोन हटाना ,ऐन्टेना का डायरेक्शन सही रखना,परदे लगाना ताकि धुप या लाइट नहीं चमके स्क्रीन पे। … हाँ बैटरी चार्ज रहे ये भी धयान रखना होता था  । इतना होने पर भी कभी कभी हम सिर्फ आवाज सुनकर काम चलाते थे। 

पूरी महाभारत याद रहती थी हमें , फिर दौर आया रंगोली और चित्रहार का , वो पांच दस गाने जितना आनद देते थे ,आज मिलना शायद दुर्लभ है। TV पे सिनेमा आता था ,शनिवार और रविवार को , शनिवार को नयी और रविवार को पुरानी और बीच में प्रादेशिक समाचार।  फीचर फ़िल्म का शेष भाग 7 बजकर 55 मिनट पर , गुस्सा बहुत आता था मगर क्या करें। 
क्रिकेट मैच में दो विंडो वाला वक़्त ,२० कैमरों में भी वो बात नहीं :)

अपना रविवार की सुबह  कुछ यूँ  होता था ,
रंगोली  कि सुबह ,महाभारत का "समय" और मोगली का "जंगल",
"ये जो है ज़िन्दगी" का वही "खट्टा-मीठा' सफ़र ।

"नीम के पेड़" की छाँव में भागते "विक्रम-बेताल",'सुरभी" से खिलती सुबह और 'चित्रहार" कमाल।

क्रूर सिंह की "यक्कू" से कांपती 'चन्द्रकान्ता',"पोटली बाबा की" और "चाणक्य" की दक्षता।

वो दौर भी बीत गया ,और वो मासूमियत  भी , कभी टीवी के लिए एक जूनून होती थी , देखते रहो चाहे कुछ भी आ रहा हो। शायद मैं कितनी दफा टीवी कि वजह से मार खाया हूँगा लेकिन वो जुनून कभी कम नहीं होता था , दूसरे गावं बहाने बना बना के TV देखने गया , ये सिलसिला तबतक चलता रहा ,जबतक मैं  इंजीनियरिंग करने आया ,फिर अचानक से मुझे एलेर्जी हो गयी ,और आजतक है।  हैरान होता हूँ लोगों को डेली सोप देखते हुए। लगता है मैंने अपने हिस्से का देख लिया ,बचपन में ही.…  

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