शनिवार, 23 मई 2015

अपनी भाषा

कहते हैं भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है ... नए ज़माने की नौकरियां ,नए ज़माने के कपडे ,नए ज़माने के खाने सब कुछ एक दम अलग जो हमारे बाप दादा किया करते थे ..बात कुछ हद तक सही भी है बीसवीं सदी की बातें शायद अब  वक़्त के साथ जंचेगी
कुछ बातें वक़्त के साथ बदली जैसे अचानक से भारतीय कपड़ो साडी और धोती का गायब हो जाना ,ये सभी सभ्यताओं के साथ हुआ, चीन और मिश्र के लोग तो एक सदी पहले ही अपने मूल भूत कपडे त्याग के यूरोपियन अपना बैठे , स्कॉटलैंड की पहचान स्कर्ट और जापान का ओरिजिनल ड्रेस अब शायद ही कभी दिखे ,कुछ मध्य पूर्व के इस्लामिक देशों के अलावा पूरा विश्व शायद अब इस मामले में एक ही है ।।
दूसरी बात  टेक्नोलॉजी का उपयोग ,कम से कम इलीट वर्ग शायद वैश्विक हो गया है अपवाद के तौर पे बस कुछ पिछड़े मुल्क ही होंगे और वो भी वहां के अशिक्षित लोग जो की हालात अपने यहाँ भी हैं । दूर गावँ में अभी भी इंटरनेट और स्मार्टफोन शायद ही कोई जनता होगा लेकिन हालात तेज़ी से बदल रहा है और एक दो दसक में शायद सब कुछ बदल जाये ।

तीसरी बात जो की तेज़ी से बदल रही वो बढ़ता  मिडिल क्लास लोग और ये लोग बड़े ही खास सोच वाले होते हैं ये ही जो किसी समाज का व्यापक रूप से निर्माण के उत्तरदायी होते हैं .लेकिन कभी कभी इनकी सोच बड़ी ही संकीर्ण होती है उदहारण के लिए भाषा का उपयोग ,इन्हे  लगता है की मातृ भाषा के उपयोग करने से वे छोटे हो जायेंगे और नीचे हो जायेंगे
ये निम्न मानसिकता हमें अभी भी आगे नहीं बढ़ने दे रही
कई भाषाएँ लुप्त हो रही और अपना वजूद खो रही है
शायद हम इस मामले में दूसरे बिकसित देशों से पीछे रह गए। जर्मनी जापान कोरिया और चीन ने दिखा दिया की आगे बढ़ने के लिए भाषा मायने नहीं रखती ।सवाल ये नहीं है की आप दूसरी भाषा  ना जाने सवाल ये है की आप अपनी ना भूलें । अपने आसपास देखता हूँ बच्चे और उनके अभिवावक मातृभाषा बताना जरुरी नहीं समझते और वो बच्चा अपने ही घर में अजनबी की तरह रहता है ,तीन पीढियां तीन भाषाएँ बोल रही होती है ,दादा और दादी मातृभाषा ,माँ और बाप कोई बड़ी भाषा और बच्चा कोई विदेशी भाषा, और शायद अपने इस मिडिल क्लास को लगता है की चलो अपना पैसा जो बड़ी सी स्कूल में लगाया है वो काम  कर रहा है ,हाय रे समझ .....

रेलयात्रा

जब भी रेल यात्रा की बात होती है तो हमारा ख्याल तीन तरह की श्रेणी में आता है , अगर आपकी यात्रा बहूत कम समय के लिए हो और आप वास्तविक भारतीय रेल का आनंद लेना चाहते हो तो कृपया साधारण श्रेणी में जाएँ ,वैसे ये बहुत ही हिंम्मत की बात है लेकिन जो अनुभव् आपको मिलेगा वो  अद्भुत होगी
अगर आपकी यात्रा 24 घंटे से ज्यादा का है तो इक बार शयनयान स्लीपर का आनंद जरूर लें
सारी दूरियां और दायरे मिट जाते हैं कुछ ही घंटों में , जैसे जैसे हम क्लास बढ़ाते हैं हमारी दूरियां यूँ ही बढ़ती जाती है या यूँ कहिये की हम सिमटते जाते हैं अपनी दुनियां में, साधारण में घंटे दो घंटे में जान पहचान ,स्लीपर में 4 से 6 घंटे वहीँ 3ऎसी में शायद दिन र लगता है , 2 ऎसी ओर एयरलाइन में तो मैंने आज तक किसी को सहयात्री से बात करते भी नही देखी
अपनी अपनी स्मार्टफ़ोन और laptop में सिमटे लोग .
वर्चुअल दुनियां में हजारों से जुडो लेकिन जो वक़्त पे काम दे वो कोई नहीं

मैंने 6 साल बाद स्लीपर् की यात्रा की ,शुरुआत में थोडा सा अटपटा लगा लेकिन लोगो की बातें और अपनापन
सही लगा
बस भारतीय रेल कुछ सुविधायें अगर साधारण जनता को भी तो हमारा कर अदा करना सार्थक हो जाये

दिशा और दशा।

सामाजिक न्याय की जो बात आज हमारे कुछ तथाकाथित नेता गण कर रहे हैं शायद अब वो शून्य हो गयी है ।राजनीती जो कभी कुछ गिने चुनी लोगो की बपौती थी आज भी है बस इसका स्वरुप बदल गया है ,पहले अगड़े समुदाय के नेता और कुछ पिछड़े ... आज राजनिती पिछड़ी समुदाय करती है और कुछ अगड़े अपना वर्च्चस्व की लड़ाई लड़ रहे हैं । अगर बिहार के परिपेक्ष्य में देखे तो समाजिक न्याय की जो लड़ाई जय प्रकाश नारायण ने जनेऊ तोड़कर शुरू की थी सही में वो लालू और नितीश युग में आकर सम्पन्न हुआ । इस लंबी लड़ाई में अगर किसी ने कुछ खोया यो वो बिहार और बिहारी जनता ।बिहार के अन्दर आवाज पाने की चाहत ने उन्हें सारी दुनिया के सामने मानो मुज़रिम बना दिया । उन्हें आज वहां वो हर समम्मान और इज्जत है जो किसी अगडी जाती की मानी जाती थी , सारी राजनीती पिछडो के बीच केंद्रित हो गयी है।
सामाजिक उथा पुथल में मानो बिहार वीरान हो गया ,जापान के बाद अगर कहीं जनसंख्या घटी है तो वो बिहार है ,चौकिये मत जनाब ,बिलकुल सही फारमाँ रहा हूँ l लोग तो बहुत बढे मगर वहां कोई नई रहता , पढ़ने लिखने की औकात रखने वाले लोग बहार हैं और जो मेहनत मजदूरी करने वाले वो भी । सिर्फ आवाज पाने से पेट नहीं भरता साहब ,आवाज तो मिल गयी मगर इस पापी पेट का क्या ऐसे तो अन्न चाहिये , बर्सो से दबे लोगों को जब पता चला की दुनिया बदल रही तो बदलती हवा भी उन्हें रोक न सकी और वो शायद ही भारत के किसी कोने में न हों।समाज का यह वर्ग अब अपने जगह पे आवाज पाकर भी नयी जगह पे बेगाना ही रहा
बिहार के गावो में सिर्फ बच्चे और बूढे रहते है ,जवान वही जिनके बहुत खेत है और एक डर है कोई हमारा जामीन न जोत ले ,10 गावँ को खिलाने में जीतना चावल आज से 20 साल पहले लगता था आज भी उतना ही लगता है , मतलब हम 1995 से आगे बढे ही नहीं  । इन्ही लोगो का प्रेम गाहे बगाहे छठ और होली में भारतीय रेल में उमड़ पड़ता है
ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली खेती  बस सिमट के रह गयी ।खेत हैं लेकिन मजदूर ही नहीं आखिर पंजाब के मुकाबले की मजदूरी बिहारी किसान कहाँ से कर पाएंगे । मशीनीकरण अभी कोषों दूर है ,हार कर लोगों ने खेती करना ही कम कर दिया है
लेकिन विकास की चमक दूर दूर तक दिख रही है ,बाहर से भेजे पैसे से पक्के मकान  हर तरफ दिखेंगे रही सही कसर सरकारी स्कीमो से पूरी हो रही है । छठ और होली के अवसर पे कुछ हलचल हो जाती है और गावँ फिर सो जाता है अगले छठ के इंतज़ार में