गुरुवार, 8 मार्च 2012

अपनी होली !!


बुरा न मानो भाई  होली है   ,

आज होली है , और बाकि  दिनों  की तरह उठा, तैयार हुआ  और ऑफिस की तरफ चल दिया ! पुरे यकीं के साथ के कोई एक टीका भी नहीं लगने वाला ! सब कुछ वैसे का वैसा , trafiic  में सरकता हुआ शहर ,भागते हुए लोग ,मैं भी उनमे से एक  अपनी कुछ यादों के साथ ! ये अनमोल यादें शायद जिसे सोचकर ये कह सकूं की भाई होली तो हम खेलते थे .

हमारे गाँव में होली एक दिन का नहीं महीने भर का त्यौहार होता था ! था क्यों , क्योंकि अब वहां भी एक ही दिन का होने लगा है  ! माघ का महीना आते ही , बसंत पंचमी के साथ फगुआ का असर दीखता था  ! कहानी शुरू होती थी होलिका दहन के लिए जुगाड़ से , अलग किसम का पहिया वाला गाड़ी बनाते थे जंगले उघने के लिए ! खेत ओगारने वाले झोपरी पे अलग से ध्यान रहता था ! हर बार अपना रिकॉर्ड सुधारना रहता था ! सिर्फ  पांच ही , अरे हम तो सात लाये थे बोले भैरो काका अकेले , लानत है आजकल के लडको पे .
फिर सम्मत(होलिका दहन ) के चारो तरफ जोगीरा गाते हुए घूमना और आग को तेज करना भी डंडे से हम लोगो का मेन काम होता था .

अगला दिन होली , कितना इंतजाम करना है , सरलका मोबिल , हरियरका आ ललका रंग  , बांस वाला पिचकारी, अबीर  सब लाना हैं . और स्पेशल बात भांग और माजूम वो अलग से , भांग बहुत देरी से चढ़ता है सो भोरे भोर खाना होता था . पता करना की सबसे बढ़िया खस्सी कौन काट रहा है , खिजा वाला उसी से लेना है मांस .

ये सब करते करते बजे १० , तब तक एक राउंड पूआ और खीर के साथ ललका रंग पोता जाता था , उजरका खीर आधा लाल हो लिया साथ में मानो वो भी खेल लिया होली .
चोरा के एक भांग की गोली भी लगा ली ,फिर निकल पड़े सबको पोतने , लाल हरा और काला रंग . गाँव के कुटुम सब के लिए स्पेशल इंतजाम रहता था , सरलका मोबिल और जरलका डीजल और हरा रंग .

२ बजते बजते रंग वाला हुडदंग ख़तम और , मुँह धो धा के अबीर वाला होली होता था , सभी बड़े लोगों के पैर पे अबीर रखकर आशीर्वाद लेना और हमउम्र को तो बस पोत देना .
३ बजे जोगीरा आता था , हनुमान मंदिर से चलकर दुआरे दुआरे कीर्तन करते हुए . सभी दुआरे पे भांग और ठंडे शरबत होते थे ! पीओ और आगे बढे
गीत वही गाते हुए  :
   "सदा आनंद रहे ओये पारे , रघुवर खेले होली हो "
   "इक दिस खेले कुवर कन्हिया , इक दिस राधा जोड़ी हो "

कुछ दूर पे जोगीरा होता था , एक अलग तरह का लोक संगीत "
" सा रा रा सा रा रा रा रा, रा रा रा रा रा रा रा रा  रा रा "
"  जोगी जी सा रा रा रा रा , जोगी जी रा रा रा रा रा रा रा " 
" कल कल कलकते मैं काली मैया , काली मैया के चढ़े दूध बताशा "
" कोई नाचे, कोई गावे , कोई देख तमाशा , बोलो सा रा रा रा रा रा रा रा "


और फिर उसका जवाब कोई देता था , ये सिलसिला शाम तक चलता रहता था .

अब चारो तरफ दिख रहा है भंग का असर , लोग अनायास हँसे जा रहे हैं , कोई किसी से सिर्फ बहस ही किये जा रहा है . कोई खाये जा रहा है , असल में भांग कमाल करता है , लोगों की क्षमता कई गुना बड़ा कर देता है .

बस कोई खाने को दे दे , वो भी खस्सी ,उपर से दिन भर की खुमारी , भांग का असर क्या खाया कितना खाया , ये बस माएं ही जानती हैं , पहली बार खाने को लेकर कोई शिकवा नहीं रहता है उस दिन !

अपनी होली तो इसी तरह होती थी , सुनते हैं गाँव भी बदल गया है , अब नहीं होते  कीर्तन जोगीरा  वहां भी ! कुछ बीअर और रम मिल जातें हैं गाँव में हीँ, लोग अपनी दुश्मनी निकलते है इस दिन . कुछ लड़के अब भी दीखते हैं सडको पे , मगर उल्टियाँ करते हुए , क्या करें मॉडर्न और अमीर जो हो गए हैं .

अपनी इन्हीं यादों के सहारे हम काल्पनिक होली खेलकर खुश हैं और कहते हैं क्या करें जमाना बदल गया है .
  
 
  
 

शनिवार, 3 मार्च 2012

गावँ आ गाछी !!



गाछी : आम का बगीचा , खांटी मैथिलि शब्द है
कौसानी : कच्चे आम का  mixed  आचार (paste)
मधुश्रावनी : मधुमास : स्पेशल महीना ,नव विवाहित युवतियों का
घोरान : लाल चीटीं , जो पेड़ पे रहती है .


बात बहुत पुरानी है , मैं शायद आठ दस साल का रहा हूँगा , होली की खुमारी ख़तम होते ही मौसम आता था महुआ का साथ में आम का मंजर , कुछ अलग ही माहौल रहता था गाछी का .


गेहुम की फसल कट के सजी है खलिहान में , और आ गया वक़्त महुआ का . महुआ का फूल सुबह सुबह चुनना . पांच टोकरी में एक चुनने वाले को , और सूरज निकलने से पहले सारा महुआ बड़े से छिट्टा में .
आजतक नहीं समझ पाया करते क्या थे उस महुए का , घर आ के उसे सुखाना फिर बोरी में भर के रखना . शायद ४-५ रुपया किलो बिकता था सुखा महुआ , कहते हैं शराब बनाने वाले ले जाते थे , पर हमें क्या १००-१५० रूपये मिलते थे हमें महीने भर की मेहनत के बाद उसका का भी तीन चार हिस्सा हम भईयों में .

खैर लौटते हैं हम गाछी की तरफ , महुआ के बाद आता था टिकला का समय , किसन भोग और बम्बई तो शायद ही बच पाता था हमारी शातिर नज़रों से , रोज नए नए तरीके टिकला तोरने के , गाछी मालिक परेशां, रखबार के रहने पर भी नहीं बच पाते थे ये टिकोले . वैसे हम सब आम को बराबर निगाह से देखते थे , आखिर टिकोला टिकोला ही है ,हाँ बीजू आम के टिकोले का कौसानी और कल्कतियाँ का आचार का जबाब नहीं , मई आते आते हमारे घरों में काफी आचार और कसौनी हो जाती थी , नहीं तो बाकि कोर कसर खटहा आम से निकल जाता था .

फिर पकना शुरू होता था बम्बई , सबसे पहले , मधुश्रावनी के साथ ही , नयी नहीं गाँव की  दुल्हन लड़कियां फूल चुनने गीत गाते हुए जाती है    अपनी सखियों के संग और हम अपनी मेहनत निकालते थे बम्बई पर , आधे आम तो गाछी मैं जमीन के नीचे पकने के लिए रख देते थे और भूल जाते थे , १० दिन बाद याद आने पर मिलती थी बस अंठी .

जून आते आते बम्बई साफ़ , लेकिन असली कहानी तो अभी बाकि है , बीजू पकने के साथ आती थी बहार गाछी में . मचान और चौकी लग जाती थी गछियों में , आखिर राखबारी जो करनी है . भाई गछ्पकू आमो का अपना अलग ही मजा है . बरका गाछी में लगते थे चार चौकी , शोभा मालिक का मचान , अर्जुन दादा का मचान , मणि काका , और बाला काका सभी तैनात . रात भर टोर्च की रोशनी जगमगाती रहती थी . पता नहीं कहाँ चले जाते है भुत प्रेत उन महीनो में , साल के बाकि दिनों में तो सात बजे के बाद हिम्मत नहीं होती थी आने की .

सुबह सुबह पके आमो के साथ लौटने का अपना अलग ही आनंद होता था . फिर दिन भर आना जाना लगा रहता था गाछी का . पका आम लुटने का अलग ही competition  होता था .
 अब इन सब में जामुन की बात न करें तो ज्यादती होगी , मजे की बात ये थी की जामुन सार्वजनिक होता था , पेड़ किसी का भी हो , इनपे सब का हक , जो जामुन तोडा , उसका  जामुन . बस पेड़ पे चढ़ना ही बहुत बड़ी बात थी , घोरान का दर , टुनुक डाल जामुन की , कई बार तो में अपनी हड्डी तोडा .

गाछी की ये बहार रहती थी ,जुलाई अंत तक . फिर आम , जामुन सभी ख़तम, और हम सिमट जाते थे अपने घरों में बारिस की बूंदों के साथ अगले साल के इंतजार में !!