बुरा न मानो भाई होली है ,
आज होली है , और बाकि दिनों की तरह उठा, तैयार हुआ और ऑफिस की तरफ चल दिया ! पुरे यकीं के साथ के कोई एक टीका भी नहीं लगने वाला ! सब कुछ वैसे का वैसा , trafiic में सरकता हुआ शहर ,भागते हुए लोग ,मैं भी उनमे से एक अपनी कुछ यादों के साथ ! ये अनमोल यादें शायद जिसे सोचकर ये कह सकूं की भाई होली तो हम खेलते थे .
हमारे गाँव में होली एक दिन का नहीं महीने भर का त्यौहार होता था ! था क्यों , क्योंकि अब वहां भी एक ही दिन का होने लगा है ! माघ का महीना आते ही , बसंत पंचमी के साथ फगुआ का असर दीखता था ! कहानी शुरू होती थी होलिका दहन के लिए जुगाड़ से , अलग किसम का पहिया वाला गाड़ी बनाते थे जंगले उघने के लिए ! खेत ओगारने वाले झोपरी पे अलग से ध्यान रहता था ! हर बार अपना रिकॉर्ड सुधारना रहता था ! सिर्फ पांच ही , अरे हम तो सात लाये थे बोले भैरो काका अकेले , लानत है आजकल के लडको पे .
फिर सम्मत(होलिका दहन ) के चारो तरफ जोगीरा गाते हुए घूमना और आग को तेज करना भी डंडे से हम लोगो का मेन काम होता था .
अगला दिन होली , कितना इंतजाम करना है , सरलका मोबिल , हरियरका आ ललका रंग , बांस वाला पिचकारी, अबीर सब लाना हैं . और स्पेशल बात भांग और माजूम वो अलग से , भांग बहुत देरी से चढ़ता है सो भोरे भोर खाना होता था . पता करना की सबसे बढ़िया खस्सी कौन काट रहा है , खिजा वाला उसी से लेना है मांस .
ये सब करते करते बजे १० , तब तक एक राउंड पूआ और खीर के साथ ललका रंग पोता जाता था , उजरका खीर आधा लाल हो लिया साथ में मानो वो भी खेल लिया होली .
चोरा के एक भांग की गोली भी लगा ली ,फिर निकल पड़े सबको पोतने , लाल हरा और काला रंग . गाँव के कुटुम सब के लिए स्पेशल इंतजाम रहता था , सरलका मोबिल और जरलका डीजल और हरा रंग .
२ बजते बजते रंग वाला हुडदंग ख़तम और , मुँह धो धा के अबीर वाला होली होता था , सभी बड़े लोगों के पैर पे अबीर रखकर आशीर्वाद लेना और हमउम्र को तो बस पोत देना .
३ बजे जोगीरा आता था , हनुमान मंदिर से चलकर दुआरे दुआरे कीर्तन करते हुए . सभी दुआरे पे भांग और ठंडे शरबत होते थे ! पीओ और आगे बढे
गीत वही गाते हुए :
"सदा आनंद रहे ओये पारे , रघुवर खेले होली हो "
"इक दिस खेले कुवर कन्हिया , इक दिस राधा जोड़ी हो "
कुछ दूर पे जोगीरा होता था , एक अलग तरह का लोक संगीत "
" सा रा रा सा रा रा रा रा, रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा "
" जोगी जी सा रा रा रा रा , जोगी जी रा रा रा रा रा रा रा "
" कल कल कलकते मैं काली मैया , काली मैया के चढ़े दूध बताशा "
" कोई नाचे, कोई गावे , कोई देख तमाशा , बोलो सा रा रा रा रा रा रा रा "
और फिर उसका जवाब कोई देता था , ये सिलसिला शाम तक चलता रहता था .
अब चारो तरफ दिख रहा है भंग का असर , लोग अनायास हँसे जा रहे हैं , कोई किसी से सिर्फ बहस ही किये जा रहा है . कोई खाये जा रहा है , असल में भांग कमाल करता है , लोगों की क्षमता कई गुना बड़ा कर देता है .
बस कोई खाने को दे दे , वो भी खस्सी ,उपर से दिन भर की खुमारी , भांग का असर क्या खाया कितना खाया , ये बस माएं ही जानती हैं , पहली बार खाने को लेकर कोई शिकवा नहीं रहता है उस दिन !
अपनी होली तो इसी तरह होती थी , सुनते हैं गाँव भी बदल गया है , अब नहीं होते कीर्तन जोगीरा वहां भी ! कुछ बीअर और रम मिल जातें हैं गाँव में हीँ, लोग अपनी दुश्मनी निकलते है इस दिन . कुछ लड़के अब भी दीखते हैं सडको पे , मगर उल्टियाँ करते हुए , क्या करें मॉडर्न और अमीर जो हो गए हैं .
अपनी इन्हीं यादों के सहारे हम काल्पनिक होली खेलकर खुश हैं और कहते हैं क्या करें जमाना बदल गया है .
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