कृषि प्रधान ईस देश में कभी हम भी खेती किया करते थे ! बात उन दिनों की है , जम हमारी उम्र कुछ १०-१२ साल की रही होगी .
दादा की नौकरी शुरू हो गयी थी मगर मूलतः वो एक किसान ही थे . गाँव का कोई मजदूर तैयार होता नहीं था उनके साथ कदम से कदम मिलकर काम करने को :) ! हमारे यहाँ एक हरवाहा रहा करते थे , मुखर पासवान ! अपनी बैलों की जोड़ी थी , एक शुद्दा दूसरा मरखाह , हाँ खाने देते वक़्त कभी नहीं मरता था . बहुत साडी भैसें आई , गायें आई मगर ये दोनों कमसकम १० साल हमारे यहाँ रहे थे . खैर बात हो रही थी खेती की .
पूरी खेती बैलों से ही होती थी उन दिनों , ट्रक्टर नया नया ही आया था और सिमित था .
सुबह सुबह मुखर बैलों को ले किसी न किसी खेत में , और उसके जलपान का जिम्मा रहता था हम लोगों का .
एक बड़ी सी मक्के की रोटी , कुछ सब्जी और आचार , साथ में पानी से भरा हूया ढोल .
लौटे हुए नहाते थे बोरिंग पर , और हाथ में रहता था एक बड़ी सी ईख का डंडा .
उन दिनों हसनपुर चीनी मिल में जाया करता था ईख , हर खेती करने वाले के यहाँ से १ ट्रक , हमरे घर से ४-५ ट्रक जाता था , लोग बस चारे के लिए मुफ्त में ही काटकर लाद देते थे ट्रक पे सारी की सारी ईख . आज तो हर काम के लिए मजदूर चाहिए .
हमारा कम होता था उनकी रखाबरी करना , जबतक ट्रक ना आये लेने . वैसे ईख रोपने में भी हम जाते थे और टोनी गिराते थे नालों मैं .
मकई की फसल में हमारा बहुत योगदान होता था , दिवाली और छठ की बचाई हुयी फटाकों के साथ , ताकि चिड़ियाँ कही खा न जाये नयी नयी कोपलों को . फिर मकई की फसल को पानी की बहुत जरुरत , ३-४ पानी तो लगेगा ही .
बोरिंग का रेट थे उन दिनों , ३० रुपया घंटा , एक घंटे मैं २-३ कता पटता था . पानी का नाला अगर टूट जाये तो आधा पानी दूसरों के खेत मैं.
चने और मटर की हरी फसल पे निगाहें रहती थी , की कब दाना हो और हम ओढ़ा भून भून कर खाएं .
हरे चने का भूना ओढ़ा और नाले के कबाई और सिंघी माछ , सीधी आग पे भूनी हूई , शायद एस जनम में दुबारा ना मिले .
फसल कट के आती थी खलिहान में . १६ भोझा पे एक भोझा मजदूर का मगर हां मजदूर वाला भोझा स्पेशल होता था , लगता था सारा गाँव उमर पड़ता था . गेहूं के लिए थ्रेशेर आता था भाड़े पे और मकई के लिए ट्रेलर . मगर दलहन तो जिम्मा होता था बैलों का , नीचे रखकर गोल गोल घूमते थे (डाऊन)दिन भर बैल और हम , तब जा के फिर उसे ओसाना ( हवा के साथ गिरना , ताकि अनाज/दल और भूसा अलग लग गिरे ) . इतनी धुल ध्हक्कर पर आजतक किसी को अस्थमा और कोई बीमारी नहीं सुनी . इतनी मेहनत के बाद सीधे चापाकल में मुह लगाकर बालू वाला पानी पीना .
कहानी यहीं नहीं ख़तम होती है , अनाज को सुखाना और कोठी में रखना भी रहता था , धुप निकले तो छत पे चढ़ाना और शाम को समेटना . घर के छत में बनाया हुआ छेद , गिराने के काम आता था .
वक़्त बहुत बदल गया है , डिजेल दिया करता था उन दिनों १० रुपया लीटर और गेहूं होता था ८ रुपया किलो .
आज डिजेल हो गया है ४५ रुपया मगर गेहूं बिकता है १० रुपया किलो . हाय रे किसान !
और भी बहुत सी बातें होती थी , अब तो भूल भी गया हूँ क्योंकि अब नहीं होती हैं वो बातें गाँव में भी .
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