कहते हैं भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है ... नए ज़माने की नौकरियां ,नए ज़माने के कपडे ,नए ज़माने के खाने सब कुछ एक दम अलग जो हमारे बाप दादा किया करते थे ..बात कुछ हद तक सही भी है बीसवीं सदी की बातें शायद अब वक़्त के साथ जंचेगी
कुछ बातें वक़्त के साथ बदली जैसे अचानक से भारतीय कपड़ो साडी और धोती का गायब हो जाना ,ये सभी सभ्यताओं के साथ हुआ, चीन और मिश्र के लोग तो एक सदी पहले ही अपने मूल भूत कपडे त्याग के यूरोपियन अपना बैठे , स्कॉटलैंड की पहचान स्कर्ट और जापान का ओरिजिनल ड्रेस अब शायद ही कभी दिखे ,कुछ मध्य पूर्व के इस्लामिक देशों के अलावा पूरा विश्व शायद अब इस मामले में एक ही है ।।
दूसरी बात टेक्नोलॉजी का उपयोग ,कम से कम इलीट वर्ग शायद वैश्विक हो गया है अपवाद के तौर पे बस कुछ पिछड़े मुल्क ही होंगे और वो भी वहां के अशिक्षित लोग जो की हालात अपने यहाँ भी हैं । दूर गावँ में अभी भी इंटरनेट और स्मार्टफोन शायद ही कोई जनता होगा लेकिन हालात तेज़ी से बदल रहा है और एक दो दसक में शायद सब कुछ बदल जाये ।
तीसरी बात जो की तेज़ी से बदल रही वो बढ़ता मिडिल क्लास लोग और ये लोग बड़े ही खास सोच वाले होते हैं ये ही जो किसी समाज का व्यापक रूप से निर्माण के उत्तरदायी होते हैं .लेकिन कभी कभी इनकी सोच बड़ी ही संकीर्ण होती है उदहारण के लिए भाषा का उपयोग ,इन्हे लगता है की मातृ भाषा के उपयोग करने से वे छोटे हो जायेंगे और नीचे हो जायेंगे
ये निम्न मानसिकता हमें अभी भी आगे नहीं बढ़ने दे रही
कई भाषाएँ लुप्त हो रही और अपना वजूद खो रही है
शायद हम इस मामले में दूसरे बिकसित देशों से पीछे रह गए। जर्मनी जापान कोरिया और चीन ने दिखा दिया की आगे बढ़ने के लिए भाषा मायने नहीं रखती ।सवाल ये नहीं है की आप दूसरी भाषा ना जाने सवाल ये है की आप अपनी ना भूलें । अपने आसपास देखता हूँ बच्चे और उनके अभिवावक मातृभाषा बताना जरुरी नहीं समझते और वो बच्चा अपने ही घर में अजनबी की तरह रहता है ,तीन पीढियां तीन भाषाएँ बोल रही होती है ,दादा और दादी मातृभाषा ,माँ और बाप कोई बड़ी भाषा और बच्चा कोई विदेशी भाषा, और शायद अपने इस मिडिल क्लास को लगता है की चलो अपना पैसा जो बड़ी सी स्कूल में लगाया है वो काम कर रहा है ,हाय रे समझ .....