मंगलवार, 28 जनवरी 2014

कुछ सवालात उलझे से !!

बहुत सी बातें इन्सान के समझ से परे है , मैं यहाँ उन बातों को नहीं छेड़ रहा हूँ ! सवाल तो पहला यही है कि भाई मैं हूँ  कौन ,  क्या कर रहा हूँ इधर ,,,,,ये सब बड़ी बातें हैं , समझ में नहीं आनेवाली , और शायद समझने की हिम्मत भी नहीं , चलिए आते हैं साधारण बातों कि तरफ।

एक उलझन होती थी ,और अभी भी होती है कि आपके पसंद  क्या है ,इस सवाल पे,,, , ये तो मैंने कभी सोचा ही ही नहीं हमें एैसी कौन सी बात खास पसंद है , हर अच्छी चीज़ें हमें भी अच्छी लगती है ,और बुरी भी।
बचपन से जवानी आ गयी मगर ये समझ ना आयी , Engg के दिनों में सबका common होता था , क्रिकेट ,म्यूजिक ,और मूवी।  कुछ नया नहीं सब के सब के बराबर, कुछ अलग बोला तो हज़ार सवाल सीनियर के !
कभी कुछ अलग करता तब तो,,,, बस वही करता रहा जो सब कोइ करता है , बनी बनायीं लीक , तो ये शिगूफे किधर से आयेंगे , अभी भी बहुत क्लियर नहीं है ,लेकिन अब कुछ समझता हूँ कि क्या मुझे ख़ुशी देती है और क्या गम !

दूसरा सवाल जिसका जबाब नहीं वो जब लोग पूछते हैं , 5 -10 बाद कहाँ देखते हो अपने आप को , अच्छी बात है ,बहुत ही अच्छी बात है ,इन्सान को दूरदृस्टी होना चाइये ,इतिहास गवाह है ,जिन्होंने आगे देखा दुनियां उन्ही कि हुयी है ,मगर मै इस विषय में एकदम फेल कर जाता हूँ , ये भी नहीं पता अगले घंटे क्या होनेवाला है ,सालों का तो आईडिया भी नहीं है , बस अगर सब सही  रहा तो खाता , गाता और मुस्कुराता रहूँगा ,,,बाकि उपरवाले कि मर्ज़ी ..

तीसरा सवाल जिसका जबाब नहीँ पता वो शादी कब कर रहे हो ,,,, जबाब बस जब हो जाये , इतने पे एक और सवाल कैसी लड़की चहिये , पहले का तो जबाब दिया नहीं अच्छे से ,,,ये वाला तो बहुत ही मुश्किल है जनाब ,,,, अगर पता होता तो खोज न लेता खुद ,,, कमाल करते हैं साहब

अगला सवाल है कि कहाँ सेटल होना चाहते हो , किस शहर में , भाई एैसा है कि जहाँ दाना पानी मिलता रहे , अब कोई फिक्स्ड तो है नहीं जिंदगी कहाँ ले जाने वाली तो बस क्या इतराना , जिधर शाम वहीं ठिकाना

 आम आदमी वाली काशिश तो हर जगह है ,लेकिन अपना केस थोडा जटिल है, अब  सवाल ये है कि मैँ गावं का हूँ या शहर का , कोई जबाब नहीं , पला बढ़ा गावं में , काम धंधा इधर !
पुरातनपंधी हूँ या मॉडर्न , शायद वहाँ भी एक कश्मकश  है , पता ही नहीं  चलता, सबके साथ रह लेता हूँ , सबके बीच बस लेता हूँ और कहीं का हूँ भी नहीं।

हिंदी छूट गयी और अंग्रेजी कभी आयी नहीं ,,, वहाँ भी रामखुदैया ,,,,,
धार्मिक बन नहीं पाया , और अधर्मी और अविश्वासी भी नहीं ,,, हाँ दुःख के वक़्त भगवन जरुर य़ाद  आते हैं

कसमकस का ये शय. कही नहीं छोड़ा है , जहाँ काम करता हूँ वहाँ भी नहीं पता कि डेवलपमेंट में हूँ कि QA में , हमेशा श्थिति ये रहती है कि बोलूं क्या , ये तो कहीं का नहीं है



शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

यूँ हीं बीते कुछ साल !!

2003 से 2013 दस  साल यूँ ही बीत  गया , कभी कभी सोचता हूँ क्या खोया क्या पाया इन लमहात में। 
क्या कुछ बदला हमारे बीच , कौन जुदा हुए हमसे और कौन नए लोग आये हमारे दरम्यान 

सवाल बहुत हैं , बहुत सी बातें बदल गयी है  परिवार ,समाज और देश में , मैं वहीं का वहीँ अभी , फर्क ये है कि मेरे जेब में कुछ पैसे आते हैं बीते हुए महीने  के साथ , और हाँ मैँ 55 से 65 KG का हो गया इस दौरान , बाकि सब वही है , कुछ नए दोस्त मिले , कुछ उलझ गए अपनी माया मोह के बंधन में। 
दुनिया थोड़ी सी उलझी लगने लगी और लोग थोड़े मतलबी से 
वक़्त थोडा सा धीरे चलने लगा है और हम थोड़े से भटके से 

उलझन बढ़ गए हैं ,रिस्ते नातों के , ज्यादा जिम्मेदार होने का तमगा मिल गया , मगर अंदर से वही हैं जाहिल और गॅवार।  
दुनिया देखी , लोग देखे , सारा जहाँ देखा , एैसे ही हैं ,सब जगह।  पेरिस कि गलियों से चीन की मुहल्लों तक एक ही नज़ारा है ! संस्कृति बदल जाते है , भाषा बदल जाते हैं ,कपडे और रहन सहन बदल जाता है लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलती वो है भागमभाग! लोग कहीं के खुश नहीं अपनी जिंदगी से , बस चाहत है एक  उन्हें जिन्दा रखी है ,,,, शायद 
जिंदादिली बस थोड़े से लोगों के पास हैं , अपने आप पे हसने का जज्बा ,दुसरो को इक मुस्कुराहट देने की इक छोटी सी कशिश और हर पल को हसीं बनाने कि चाहत ! सुनने में बड़ा ही अजीब लगता  है लेकिन इतने मगन हो जाता हैं ये इन्सान कि पता ही नहीं चलता कि चल क्या रहा है अपने वजूद के साथ 
कभी   कभी यूँ  ही  ख्याल   आता  है  कि  कौन  सा  जज्बा  है  जो रखती  है  इन्सान  का  वजूद 
कि  जबकि  हमको  भी  पता  है  कि  कुछ  भी  नहीं  है  यहाँ  हमेशा  के  लिए  हर चीज़े  पुरानी होती  है ,वक़्त  के  साथ  बदलती  है !

एक  सोच  ही जो हमें अलग करती हैं  गैरों से चाहे वो इन्सान हो या जानवर , यही वो शय है जो सारे गम कि जननी है , ना सोचो और खुश रहो। सोच अच्छी या बुरी , माया को जनम देती है और माया ही तो वजह सारे दुखों की , चाहे वो भौतिक सुखों का हो या मानसिक आहतों का 
अगर एक बहती नदी के तरह सिर्फ लगे रहे अपने कामों में तब शायद सब सही रहे , गीता में भी कहा गया बस तू लगा रह बिना सोचे और फल कि आशा किये , लेकिन ये पापी इन्सान मानने वाला थोड़े ना है ,कर्म तो हम  करेंगे नहीं लेकिन फल हमे दिखना चाहिए ,मैं भी उनमे से इक हूँ ! एक एैसे राह पे चलते जाना है जिसका कोई मंजिल नहीं , बस बिना सोचे ,बिना जाने। ............................ 

सोमवार, 13 जनवरी 2014

दूरदर्शन और हम !!




आज भले इंटरनेट LED/एलसीडी कितना इतरा लें। ..  दूरदर्शन और टेलिविशन  TV का बहुत जोर चला है 
बात उन दिनों की है , जब TV होना बहुत  ही बड़ी बात होती थी और सिर्फ गिने चुने लोगोँ के पास ये सौभाग्य होता था।  रंगीन को जाने  दें  जनाब , ब्लैक एंड वाइट TV होना भी बहुत बात होती थी , रंगीन TV तो बस  कुछ के पास होते थे वो भी शहरों में , लोग टीवी धार्मिक कार्यक्रम देखने  मीलों चले जाते थे। 

 दौर था लेट 80s का , रामायण और महाभारत आते थे TV पे , अपने  यहाँ दो चैनल आते थे एक दूरदर्शन और दूसरी नेपाल TV चैंनल। उस ज़माने में TV सिर्फ रामायण और महाभारत के  वजह से बिकते थे , कम से कम अपने गावं में  सारे TV सेट। 
टीवी का स्टैण्डर्ड साइज़ होता था १४ इन्च ,और बहुत सारी ताम झाम होते थे साथ में , ,ऐन्टेना ,बूस्टर दो दो , बैटरी १२ वोल्ट वाला  ,चार्जर।  बिजली होती ही बहुत कम थी तो बैटरी का सहारा रहता था। एंटीना घुमा के फ़ोटो सही कर देने पे वो प्राउड महसूस होता था जो आज शायद ही नसीब हो। 
 
इसी ज़माने  में आयी थी ,अपनी बुश टीवी , एकदम नयी नयी दुल्हन कि तरह ,सन 1987 -88 मे , रविवार दिन १० बजे आता था महाभारत इंडिया से और शनिवार रात ९ बजे रामायण नेपाल  से।  कम से कम १००-150 लोग आते थे देखने। टीवी बाहर  निकलती थी कम से कम 10 मिनट पहले ,बैटरी के क्लिप से कार्बोन हटाना ,ऐन्टेना का डायरेक्शन सही रखना,परदे लगाना ताकि धुप या लाइट नहीं चमके स्क्रीन पे। … हाँ बैटरी चार्ज रहे ये भी धयान रखना होता था  । इतना होने पर भी कभी कभी हम सिर्फ आवाज सुनकर काम चलाते थे। 

पूरी महाभारत याद रहती थी हमें , फिर दौर आया रंगोली और चित्रहार का , वो पांच दस गाने जितना आनद देते थे ,आज मिलना शायद दुर्लभ है। TV पे सिनेमा आता था ,शनिवार और रविवार को , शनिवार को नयी और रविवार को पुरानी और बीच में प्रादेशिक समाचार।  फीचर फ़िल्म का शेष भाग 7 बजकर 55 मिनट पर , गुस्सा बहुत आता था मगर क्या करें। 
क्रिकेट मैच में दो विंडो वाला वक़्त ,२० कैमरों में भी वो बात नहीं :)

अपना रविवार की सुबह  कुछ यूँ  होता था ,
रंगोली  कि सुबह ,महाभारत का "समय" और मोगली का "जंगल",
"ये जो है ज़िन्दगी" का वही "खट्टा-मीठा' सफ़र ।

"नीम के पेड़" की छाँव में भागते "विक्रम-बेताल",'सुरभी" से खिलती सुबह और 'चित्रहार" कमाल।

क्रूर सिंह की "यक्कू" से कांपती 'चन्द्रकान्ता',"पोटली बाबा की" और "चाणक्य" की दक्षता।

वो दौर भी बीत गया ,और वो मासूमियत  भी , कभी टीवी के लिए एक जूनून होती थी , देखते रहो चाहे कुछ भी आ रहा हो। शायद मैं कितनी दफा टीवी कि वजह से मार खाया हूँगा लेकिन वो जुनून कभी कम नहीं होता था , दूसरे गावं बहाने बना बना के TV देखने गया , ये सिलसिला तबतक चलता रहा ,जबतक मैं  इंजीनियरिंग करने आया ,फिर अचानक से मुझे एलेर्जी हो गयी ,और आजतक है।  हैरान होता हूँ लोगों को डेली सोप देखते हुए। लगता है मैंने अपने हिस्से का देख लिया ,बचपन में ही.…  

"

बुधवार, 8 जनवरी 2014

गाँव और क्रिकेट !!



मेरे गाँव और क्रिकेट  बहुत पुराना नाता है , जब  तक बहुत  बच्चे थे तो चोर नुकइया और राजा कबड्डी खेलते थे,उम्र के साथ वो बेकार लगने लगा.

शुरुआत  में हमें दूध भात खिलाडी  रखा जाता था ,  विकेट कीपर के पीछे गेंद पकड़ने को ,गेंद होती थी कोर्केट वाली ,बहुत चोट लगती थी , शायद  ही कभी  बैटिंग का मौका मिला होगा
खैर वक़्त के साथ  हम थोड़े बड़े हुए और टीम का रेगुलर मेंबर बने , बोलिंग एन्ड बैटिंग दोनों, टूर्नामेंट खेलने जाना दूसरे टोल और बुलाना उन्हें अपने पिच पे , अपने यहाँ हारना शर्म कि बात होती थी
ज्यादा वक़्त हरने के केस में झगड़ा होना ही था
अच्छे खिलाडी थे , मुआरी चाचा ,पंकज ,कारी भैया ,सरोज भैया ,मनोज ,बौना ,फुरफुरिआ ,धनञ्जय और भी बहुत, हमारे मेनेजर होते थे नथुनी चाचा
शाम के ४ बजते ही कठमी गाछ के नीचे वाली पिच में काठ का भारी बैट और कॉकेट कि गेंद , हाथ और पाऊँ बचाना खिलाडी का जिम्मा, पहली बार जब ओरिजिनल बैट आया ,तब जाना कि क्रिकेट कितना आसान है
शायद राघो जी ने दिया था पैसा ,आज भी यद् है  हमें, वो बहुत प्यार करते थे बच्चों से, तभी आज शायद आगे और खुश हैं जिंदगी में।
कभी कभी टूर्नामेंट खेलने जाते थे दुसरे गाव में ,बोरो प्लेयर के साथ खेल नहीं सकते ये शर्त होती थी अपनी और हाँ एक अम्पायर अपना होता था :) ज्यादा टाइम हम हारके ही आते थे मगर क्या मजाल कि भरोसा कम हो जाये।  कोई नियम  नहीं ,कोई रूल नहीं ,lbw का तो नियम ही नहीं था मगर किसी कि क्या हिम्मत कि पैर भी लगाये ,चोट का इतना डर। छ बाल का ओवर होना भी रेयर ही था,करते रहो ,जब कोई टोके तो बोल दो ५ गेंद हुयी , फील्डिंग बस नाम का ही होता था ,अगर कभी किसी ने पकड़ लिया तो बड़ी बात नहीं तो गाछ ही हमारे फील्डर थे।

इस साल जब गाव गया ,तो बहुत खेला बच्चों के साथ ,कुछ तो २०-25 साल छोटे थे  । बहुतों को जनता तक नहीं था ,मेरे दोस्तोँ के बच्चे। एक  जेनेरशन पुराना हो गया हूँ अब।  अब उनके पास अच्छे अच्छे बैट हैं ,टेनिस वाली गेंद हैं ,बदला नहीं है तो गाछी और खेलने वाला पिच , अभी भी गेंद खोती है नाले के गंदे पानी में ,अभी भी गेंद खोती है अरहर के खेत में ,जाती है बाल खरही में और गन्दगी में लेकिन जूनून वही है खेलने का।

आजकल पैसे`पे होने लगा है खेल और सिर्फ बहुत छोटे बच्चे खेलते हैं ,पता नहीं क्यों ,बड़े सिर्फ तास खेलते हैं
एक और बात , उन दिनों टेनिस गेंद नहीं होती थी,और आपको हाथ घुमा कर बोलिंग करनी होती थी , आज कल हर कोई ढेपा फेकता है ,और वही स्टैण्डर्ड हो गया है। खिलाडी वैसे ही हैं बल्कि अच्छा खलते हैं और लड़ाई झगड़ा भी बहुत कम हो गया हैं। बच्चे तैयार हैं बड़ों के साथ खेलने को मगर कोई खेलता ही नहीं।
इतनी जल्दी लोग बड़े क्यों हो जाते हैं। .... सवाल वहीँ है …।