बात उन दिनों की है , जब TV होना बहुत ही बड़ी बात होती थी और सिर्फ गिने चुने लोगोँ के पास ये सौभाग्य होता था। रंगीन को जाने दें जनाब , ब्लैक एंड वाइट TV होना भी बहुत बात होती थी , रंगीन TV तो बस कुछ के पास होते थे वो भी शहरों में , लोग टीवी धार्मिक कार्यक्रम देखने मीलों चले जाते थे।
दौर था लेट 80s का , रामायण और महाभारत आते थे TV पे , अपने यहाँ दो चैनल आते थे एक दूरदर्शन और दूसरी नेपाल TV चैंनल। उस ज़माने में TV सिर्फ रामायण और महाभारत के वजह से बिकते थे , कम से कम अपने गावं में सारे TV सेट।
टीवी का स्टैण्डर्ड साइज़ होता था १४ इन्च ,और बहुत सारी ताम झाम होते थे साथ में , ,ऐन्टेना ,बूस्टर दो दो , बैटरी १२ वोल्ट वाला ,चार्जर। बिजली होती ही बहुत कम थी तो बैटरी का सहारा रहता था। एंटीना घुमा के फ़ोटो सही कर देने पे वो प्राउड महसूस होता था जो आज शायद ही नसीब हो।
इसी ज़माने में आयी थी ,अपनी बुश टीवी , एकदम नयी नयी दुल्हन कि तरह ,सन 1987 -88 मे , रविवार दिन १० बजे आता था महाभारत इंडिया से और शनिवार रात ९ बजे रामायण नेपाल से। कम से कम १००-150 लोग आते थे देखने। टीवी बाहर निकलती थी कम से कम 10 मिनट पहले ,बैटरी के क्लिप से कार्बोन हटाना ,ऐन्टेना का डायरेक्शन सही रखना,परदे लगाना ताकि धुप या लाइट नहीं चमके स्क्रीन पे। … हाँ बैटरी चार्ज रहे ये भी धयान रखना होता था । इतना होने पर भी कभी कभी हम सिर्फ आवाज सुनकर काम चलाते थे।
पूरी महाभारत याद रहती थी हमें , फिर दौर आया रंगोली और चित्रहार का , वो पांच दस गाने जितना आनद देते थे ,आज मिलना शायद दुर्लभ है। TV पे सिनेमा आता था ,शनिवार और रविवार को , शनिवार को नयी और रविवार को पुरानी और बीच में प्रादेशिक समाचार। फीचर फ़िल्म का शेष भाग 7 बजकर 55 मिनट पर , गुस्सा बहुत आता था मगर क्या करें।
क्रिकेट मैच में दो विंडो वाला वक़्त ,२० कैमरों में भी वो बात नहीं :)
अपना रविवार की सुबह कुछ यूँ होता था ,
रंगोली कि सुबह ,महाभारत का "समय" और मोगली का "जंगल",
"ये जो है ज़िन्दगी" का वही "खट्टा-मीठा' सफ़र ।
"नीम के पेड़" की छाँव में भागते "विक्रम-बेताल",'सुरभी" से खिलती सुबह और 'चित्रहार" कमाल।
क्रूर सिंह की "यक्कू" से कांपती 'चन्द्रकान्ता',"पोटली बाबा की" और "चाणक्य" की दक्षता।
"नीम के पेड़" की छाँव में भागते "विक्रम-बेताल",'सुरभी" से खिलती सुबह और 'चित्रहार" कमाल।
क्रूर सिंह की "यक्कू" से कांपती 'चन्द्रकान्ता',"पोटली बाबा की" और "चाणक्य" की दक्षता।
वो दौर भी बीत गया ,और वो मासूमियत भी , कभी टीवी के लिए एक जूनून होती थी , देखते रहो चाहे कुछ भी आ रहा हो। शायद मैं कितनी दफा टीवी कि वजह से मार खाया हूँगा लेकिन वो जुनून कभी कम नहीं होता था , दूसरे गावं बहाने बना बना के TV देखने गया , ये सिलसिला तबतक चलता रहा ,जबतक मैं इंजीनियरिंग करने आया ,फिर अचानक से मुझे एलेर्जी हो गयी ,और आजतक है। हैरान होता हूँ लोगों को डेली सोप देखते हुए। लगता है मैंने अपने हिस्से का देख लिया ,बचपन में ही.…
"


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें