2003 से 2013 दस साल यूँ ही बीत गया , कभी कभी सोचता हूँ क्या खोया क्या पाया इन लमहात में।
क्या कुछ बदला हमारे बीच , कौन जुदा हुए हमसे और कौन नए लोग आये हमारे दरम्यान
सवाल बहुत हैं , बहुत सी बातें बदल गयी है परिवार ,समाज और देश में , मैं वहीं का वहीँ अभी , फर्क ये है कि मेरे जेब में कुछ पैसे आते हैं बीते हुए महीने के साथ , और हाँ मैँ 55 से 65 KG का हो गया इस दौरान , बाकि सब वही है , कुछ नए दोस्त मिले , कुछ उलझ गए अपनी माया मोह के बंधन में।
दुनिया थोड़ी सी उलझी लगने लगी और लोग थोड़े मतलबी से
वक़्त थोडा सा धीरे चलने लगा है और हम थोड़े से भटके से
उलझन बढ़ गए हैं ,रिस्ते नातों के , ज्यादा जिम्मेदार होने का तमगा मिल गया , मगर अंदर से वही हैं जाहिल और गॅवार।
दुनिया देखी , लोग देखे , सारा जहाँ देखा , एैसे ही हैं ,सब जगह। पेरिस कि गलियों से चीन की मुहल्लों तक एक ही नज़ारा है ! संस्कृति बदल जाते है , भाषा बदल जाते हैं ,कपडे और रहन सहन बदल जाता है लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलती वो है भागमभाग! लोग कहीं के खुश नहीं अपनी जिंदगी से , बस चाहत है एक उन्हें जिन्दा रखी है ,,,, शायद
जिंदादिली बस थोड़े से लोगों के पास हैं , अपने आप पे हसने का जज्बा ,दुसरो को इक मुस्कुराहट देने की इक छोटी सी कशिश और हर पल को हसीं बनाने कि चाहत ! सुनने में बड़ा ही अजीब लगता है लेकिन इतने मगन हो जाता हैं ये इन्सान कि पता ही नहीं चलता कि चल क्या रहा है अपने वजूद के साथ
कभी कभी यूँ ही ख्याल आता है कि कौन सा जज्बा है जो रखती है इन्सान का वजूद
कि जबकि हमको भी पता है कि कुछ भी नहीं है यहाँ हमेशा के लिए हर चीज़े पुरानी होती है ,वक़्त के साथ बदलती है !
एक सोच ही जो हमें अलग करती हैं गैरों से चाहे वो इन्सान हो या जानवर , यही वो शय है जो सारे गम कि जननी है , ना सोचो और खुश रहो। सोच अच्छी या बुरी , माया को जनम देती है और माया ही तो वजह सारे दुखों की , चाहे वो भौतिक सुखों का हो या मानसिक आहतों का
अगर एक बहती नदी के तरह सिर्फ लगे रहे अपने कामों में तब शायद सब सही रहे , गीता में भी कहा गया बस तू लगा रह बिना सोचे और फल कि आशा किये , लेकिन ये पापी इन्सान मानने वाला थोड़े ना है ,कर्म तो हम करेंगे नहीं लेकिन फल हमे दिखना चाहिए ,मैं भी उनमे से इक हूँ ! एक एैसे राह पे चलते जाना है जिसका कोई मंजिल नहीं , बस बिना सोचे ,बिना जाने। ............................
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