बहुत सी बातें इन्सान के समझ से परे है , मैं यहाँ उन बातों को नहीं छेड़ रहा हूँ ! सवाल तो पहला यही है कि भाई मैं हूँ कौन , क्या कर रहा हूँ इधर ,,,,,ये सब बड़ी बातें हैं , समझ में नहीं आनेवाली , और शायद समझने की हिम्मत भी नहीं , चलिए आते हैं साधारण बातों कि तरफ।
एक उलझन होती थी ,और अभी भी होती है कि आपके पसंद क्या है ,इस सवाल पे,,, , ये तो मैंने कभी सोचा ही ही नहीं हमें एैसी कौन सी बात खास पसंद है , हर अच्छी चीज़ें हमें भी अच्छी लगती है ,और बुरी भी।
बचपन से जवानी आ गयी मगर ये समझ ना आयी , Engg के दिनों में सबका common होता था , क्रिकेट ,म्यूजिक ,और मूवी। कुछ नया नहीं सब के सब के बराबर, कुछ अलग बोला तो हज़ार सवाल सीनियर के !
कभी कुछ अलग करता तब तो,,,, बस वही करता रहा जो सब कोइ करता है , बनी बनायीं लीक , तो ये शिगूफे किधर से आयेंगे , अभी भी बहुत क्लियर नहीं है ,लेकिन अब कुछ समझता हूँ कि क्या मुझे ख़ुशी देती है और क्या गम !
दूसरा सवाल जिसका जबाब नहीं वो जब लोग पूछते हैं , 5 -10 बाद कहाँ देखते हो अपने आप को , अच्छी बात है ,बहुत ही अच्छी बात है ,इन्सान को दूरदृस्टी होना चाइये ,इतिहास गवाह है ,जिन्होंने आगे देखा दुनियां उन्ही कि हुयी है ,मगर मै इस विषय में एकदम फेल कर जाता हूँ , ये भी नहीं पता अगले घंटे क्या होनेवाला है ,सालों का तो आईडिया भी नहीं है , बस अगर सब सही रहा तो खाता , गाता और मुस्कुराता रहूँगा ,,,बाकि उपरवाले कि मर्ज़ी ..
तीसरा सवाल जिसका जबाब नहीँ पता वो शादी कब कर रहे हो ,,,, जबाब बस जब हो जाये , इतने पे एक और सवाल कैसी लड़की चहिये , पहले का तो जबाब दिया नहीं अच्छे से ,,,ये वाला तो बहुत ही मुश्किल है जनाब ,,,, अगर पता होता तो खोज न लेता खुद ,,, कमाल करते हैं साहब
अगला सवाल है कि कहाँ सेटल होना चाहते हो , किस शहर में , भाई एैसा है कि जहाँ दाना पानी मिलता रहे , अब कोई फिक्स्ड तो है नहीं जिंदगी कहाँ ले जाने वाली तो बस क्या इतराना , जिधर शाम वहीं ठिकाना
आम आदमी वाली काशिश तो हर जगह है ,लेकिन अपना केस थोडा जटिल है, अब सवाल ये है कि मैँ गावं का हूँ या शहर का , कोई जबाब नहीं , पला बढ़ा गावं में , काम धंधा इधर !
पुरातनपंधी हूँ या मॉडर्न , शायद वहाँ भी एक कश्मकश है , पता ही नहीं चलता, सबके साथ रह लेता हूँ , सबके बीच बस लेता हूँ और कहीं का हूँ भी नहीं।
हिंदी छूट गयी और अंग्रेजी कभी आयी नहीं ,,, वहाँ भी रामखुदैया ,,,,,
धार्मिक बन नहीं पाया , और अधर्मी और अविश्वासी भी नहीं ,,, हाँ दुःख के वक़्त भगवन जरुर य़ाद आते हैं
कसमकस का ये शय. कही नहीं छोड़ा है , जहाँ काम करता हूँ वहाँ भी नहीं पता कि डेवलपमेंट में हूँ कि QA में , हमेशा श्थिति ये रहती है कि बोलूं क्या , ये तो कहीं का नहीं है
एक उलझन होती थी ,और अभी भी होती है कि आपके पसंद क्या है ,इस सवाल पे,,, , ये तो मैंने कभी सोचा ही ही नहीं हमें एैसी कौन सी बात खास पसंद है , हर अच्छी चीज़ें हमें भी अच्छी लगती है ,और बुरी भी।
बचपन से जवानी आ गयी मगर ये समझ ना आयी , Engg के दिनों में सबका common होता था , क्रिकेट ,म्यूजिक ,और मूवी। कुछ नया नहीं सब के सब के बराबर, कुछ अलग बोला तो हज़ार सवाल सीनियर के !
कभी कुछ अलग करता तब तो,,,, बस वही करता रहा जो सब कोइ करता है , बनी बनायीं लीक , तो ये शिगूफे किधर से आयेंगे , अभी भी बहुत क्लियर नहीं है ,लेकिन अब कुछ समझता हूँ कि क्या मुझे ख़ुशी देती है और क्या गम !
दूसरा सवाल जिसका जबाब नहीं वो जब लोग पूछते हैं , 5 -10 बाद कहाँ देखते हो अपने आप को , अच्छी बात है ,बहुत ही अच्छी बात है ,इन्सान को दूरदृस्टी होना चाइये ,इतिहास गवाह है ,जिन्होंने आगे देखा दुनियां उन्ही कि हुयी है ,मगर मै इस विषय में एकदम फेल कर जाता हूँ , ये भी नहीं पता अगले घंटे क्या होनेवाला है ,सालों का तो आईडिया भी नहीं है , बस अगर सब सही रहा तो खाता , गाता और मुस्कुराता रहूँगा ,,,बाकि उपरवाले कि मर्ज़ी ..
तीसरा सवाल जिसका जबाब नहीँ पता वो शादी कब कर रहे हो ,,,, जबाब बस जब हो जाये , इतने पे एक और सवाल कैसी लड़की चहिये , पहले का तो जबाब दिया नहीं अच्छे से ,,,ये वाला तो बहुत ही मुश्किल है जनाब ,,,, अगर पता होता तो खोज न लेता खुद ,,, कमाल करते हैं साहब
अगला सवाल है कि कहाँ सेटल होना चाहते हो , किस शहर में , भाई एैसा है कि जहाँ दाना पानी मिलता रहे , अब कोई फिक्स्ड तो है नहीं जिंदगी कहाँ ले जाने वाली तो बस क्या इतराना , जिधर शाम वहीं ठिकाना
आम आदमी वाली काशिश तो हर जगह है ,लेकिन अपना केस थोडा जटिल है, अब सवाल ये है कि मैँ गावं का हूँ या शहर का , कोई जबाब नहीं , पला बढ़ा गावं में , काम धंधा इधर !
पुरातनपंधी हूँ या मॉडर्न , शायद वहाँ भी एक कश्मकश है , पता ही नहीं चलता, सबके साथ रह लेता हूँ , सबके बीच बस लेता हूँ और कहीं का हूँ भी नहीं।
हिंदी छूट गयी और अंग्रेजी कभी आयी नहीं ,,, वहाँ भी रामखुदैया ,,,,,
धार्मिक बन नहीं पाया , और अधर्मी और अविश्वासी भी नहीं ,,, हाँ दुःख के वक़्त भगवन जरुर य़ाद आते हैं
कसमकस का ये शय. कही नहीं छोड़ा है , जहाँ काम करता हूँ वहाँ भी नहीं पता कि डेवलपमेंट में हूँ कि QA में , हमेशा श्थिति ये रहती है कि बोलूं क्या , ये तो कहीं का नहीं है
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