इस कहानी के कोई भी सभी पात्र काल्पनिक नहीं हैं और सबका जीवित ब्यक्तियों के साथ सम्बंध हैं
ये कहानी शुरू होती है सन २००३ से ,
वैसे तो सारे कॉलेज कि एक ही कहानी होती है , लेकिन अपना बहुत ही स्पेशल था , सुनते है अब बदल गया है। सन 1955 से अपना सर उठाये हुए है मुजफ्फरपुर में , इतना बदनाम कि बस स्टेंड से कोई भी ऑटो वाला जाने को ना तैयार , बहुत ही बड़े बड़े अलुमिनी है , लेकिन लोकल लोगो के लिए इस कॉलेज में सिर्फ गुंडे और बदमाश बढ़ते हैँ , जो कि पूरी तरह से गलत है/ फिर ये बदनामी का दाग दामन पे क्यों ,बातें होंगी इस बारे में
एक बात जो पहले दिन सीखा , वो था phylum , ये एक शब्द जिसका मतलब इस तरह से है
"A large division of possibly genetically related families of languages or linguistic stocks"
अपने यहाँ इसका मतलब सीधा होता था कि भैया किस जात से हो , कोई हिचक नहीं खुलेआम , आधे तो सरनाम से पता चल जाता था बाकि का पूछ लिया जाता था , बताना ही पड़ता था और कोई भी चारा नहीं बचने का । सारा तामझाम तो उसी से शुरू होना था ये शब्द से सब कुछ तय होता था अगले चार पांच साल का
सफ़र, पहली बार मैंने जाना की मेरे सरनेम और जाती का क्या रिश्ता है , कुछ कुछ ओवरलैपिंग होता था तो confusion होता था। कालेज में घुसते ही ग्रुप मिल जाता था और कहाँ अगला चार पांच साल गुजरना है , पहले से फिक्स , कौन से आपके दोस्त होंगे ये भी ऑलमोस्ट फिक्स। अपना वही हाल हुआ , पहुँचते ही सीनियर ग्रुप मिल गया , कहाँ रहना है , क्या खाना है , बोलना है , नहीं बोलना है , सब उनके हिसाब से , बस जी में जी मिलाते रहे ,
फेज : 1 : पहला
बात शुरू करते हैं पहले कुछ महीने की, शायद ही दुनिया के किसी जगह पे ेऐसा रैगिंग होता होगा। एक बार ये क्लियर हो गया आप किस phylum से हो फिर शुरू होता था टॉर्चेर का दौड़। कुछ विशेष नियम होते थे। …। --जूनियर मुर्गो के लिए (स्पेशल नाम मुर्गा ,फच्चा ,फ्रेशेर )
-- सुबह 6 बजे बजे उठना ,पुरे फॉर्मल ड्रेस में दिन भर , रात के 11 तक
--- नज़र हमेशा थर्ड बटन पर और कॉलर हमेशा बंद
--कॉलेज में इन्सान क्या कुत्तों तक को wish करना , गुड मॉर्निंग ,गुड आफ्टरनून , गुड डे ऐसा आदत पड़ा की आजतक किसी सीनियर को देखते निकल जाता है
-- एक स्पेशल नियम थी " Seniors are always right , if they are not please follow part one "
--Senior का बात नहीँ मानने का मतलब ,mutiny ,rabel और सजा यहाँ बयां नहीं कर सकता बस समझ लीजिये की आधी जान निकाल देते थे
-- आप बड़े बाल नहीं रख सकते , अकेले बाहर नहीं जा सकते , मतलब आप सोने , जांगने ,हसने,बोलने सब सीनियर्स decide करते थे
--हर दिन लगता था की ये extreme है , इससे बढ़कर क्या हो सकता है लेकिन "Sky has no limit "
-- सीनियर रहने पे जूनियर के पैसे खर्च करने का सवाल ही नहीं , सुट्टा ,चाय तो नार्मल ,सिनेमा हॉल से लेकर बस टिकट तक देना होता था
--सीनियर के सारे जर्नल ,कॉपी टेस्ट्स नोट्स अच्छे राइटिंग वाले जूनियर करते थे
रैगिंग लेने का काम सिर्फ Immediate seniors का था , वो बाप होते थे , दादा जी और बड़े दादा जी बहुत कम वो भी एब्नार्मल केस में (pre final year , final year seniors )
रैगिंग ग्रुप और individual दोनों लेवल पे होते थे।
अगर कुछ स्पेशल skill , जैसे , गाना वगैरह हो तो थोड़ा बच सकते थे
Cigarettes ,शराब ये सब बहुत नार्मल बात और मना करने का सवाल ही नहीं होता था
फेज 2 :
फिर आता था दौर फ्रेशेर पार्टी का , अपने यहाँ का रीत जरा सा निराला था , अब रैगिंग हुई phylam के हिसाब से तो पार्टी भी उसी तरह , शहर का कोई होटल बुक होता था , सारे immediate सीनियर्स चंदा करते थे ,और हमारा टाई को ढीला कर दिया जाता था उस दिन। बहुत कुछ तो याद नहीं अलग से मिस्टर फ्रेशेर के सिवा लेकिन हाँ दारू बहुत पीना होता था,और जबरदस्ती का नाच गाना ,
भाई साब डांस भी अजीब , बस नौटंकी कह लो
और अब हम हो गए आजाद पंछी , लेकिन सीनियर इस ऑलवेज करेक्ट वाला बात जिंदगी भर के लिए हो जाती थी , गुड डे सर और गुड मॉर्निंग सर जैसे मानो जबान से चिपक जाती है
पढाई और परीक्षा !
उस दौर में कुछ अजीब से दास्तान हुए थे , बिहार यूनिवर्सिटी में था अपना कॉलेज , लालू का राज था , शिक्षा व्यवस्था की मनो बैंड बज गयी थी , हमारे कॉलेज में एक सिविल के अलावा सारे डिपार्टमेंट्स में टीचर ही नहीं ,सो कॉलेज बस टाइम पास होता था , बस कुछ टीचर अपने क्लासेज लेते थे और बच्चे भी नाम मात्र
सारे परीक्षाएं कॉलेज में ही होती थी ,इंटरनल्स और यूनिवर्सिटी एग्जाम। ये वो दौर था जब इयरली सिस्टम था और साल में दो इंटरनल्स एंड एक यूनिवर्सिटी पेपर्स होते थे।
एग्जाम का स्तर दिन बा दिन गिरता जा रहा था , कोई भी कॉलेज एग्जाम के लिए नहीं पढता था , GATE और PSU का preparation करना मूख्य ध्येय था पढ़ने का
अजीब अजीब नुस्खे होते थे चीटिंग करने के , कहाँ से शुरू करूँ
पहले कहानी शुरू हुयी चिट पुर्जों से , थोड़ी से धाख थी शिक्षकों की , नज़र से बचा के कॉपी कर लिया , कभी सर ने अवॉयड किया तो कभी कुछ देर के लिए कॉपी ले ली।
फिर थोड़ी आगे बढ़ी ,माइक्रो (पूरी किताब का मिनी ज़ेरॉक्स ) छुपकर जाने लगा , अब शायद शिक्षक भी हर मान गए थे , लेकिन थोड़ी सी शर्म बाकि थी लड़कों में , बेचारे टीचर भी क्या करें क्लास भी तो शायद ही ले पाते थे।
एक दो साल में मंजर बदल गया , सरे शर्म और तेल लेने गयी , माइक्रो का खर्च भी ज्यादा लगने लगा और सब को सब कुछ पता ही है, पूरी की पूरी किताब जाने लगी , एग्जाम हॉल में , सवाल ये था की आंसर कहाँ और कैसे मिलेंगे , कितना लिखना है , कहाँ से कहाँ तक , पूरी एग्जाम रूम एक मछली बाजार हो जाता था , आधे घंटे के अंदर सरे स्टूडेंट्स इधेर से उधेर आपने अपने ग्रुप में,
अति तो तब हुयी जब कार्बन कॉपी तक आने लगी ताकि वक़्त बचाया जा सके ,एक सवाल मैं करूँ एक सवाल तू करे ,और फिर अदला बदली कॉपी कार्बन से
ये सब मुख्यतया फाइनल और प्रे फाइनल वाले करते थे , फर्स्ट और सेकंड ईयर वाले अभी भी डरते थे और थोड़ी सी पानी था उनकी आँखों में,
खैर ये सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला , यूनिवर्सिटी में पता चला , बिहार की सरकार बदली , एग्जाम इनटर्नल से एक्सटर्नल हुआ वो भी यूनिवर्सिटी के कॉमन हॉल में अंडर रैपिड एक्शन फ़ोर्स और फिर क्या शमा था। .......... कल तक किताब खोल के नक़ल करने वाले अब सर तक नहीं हिला सकते थे, पाप का घड़ा शायद भर गया , बहुतों को बैक लगा , सबों ने पढ़ना और रटना शुरू कर दिया , सिर्फ यूनिवर्सिटी क्लियर करना है भाई।
जनबरी महीने में आता था GATE का result और कॉलेज के दीवारें रंग जाती थी पोस्टरों से .... congratulation वाले ... समझ में नहीं आता था ये सब पढ़ते कब थे यैसे हालत में एक दो नहीं कई रैंक होल्डर खासकर civil mechanical और electrical में फिर किसी ने Psu निकाल ली वो कहानी चलती रहती थी चाय सुट्टा वाले टपरे पर
ये कहानी शुरू होती है सन २००३ से ,
वैसे तो सारे कॉलेज कि एक ही कहानी होती है , लेकिन अपना बहुत ही स्पेशल था , सुनते है अब बदल गया है। सन 1955 से अपना सर उठाये हुए है मुजफ्फरपुर में , इतना बदनाम कि बस स्टेंड से कोई भी ऑटो वाला जाने को ना तैयार , बहुत ही बड़े बड़े अलुमिनी है , लेकिन लोकल लोगो के लिए इस कॉलेज में सिर्फ गुंडे और बदमाश बढ़ते हैँ , जो कि पूरी तरह से गलत है/ फिर ये बदनामी का दाग दामन पे क्यों ,बातें होंगी इस बारे में
एक बात जो पहले दिन सीखा , वो था phylum , ये एक शब्द जिसका मतलब इस तरह से है
"A large division of possibly genetically related families of languages or linguistic stocks"
अपने यहाँ इसका मतलब सीधा होता था कि भैया किस जात से हो , कोई हिचक नहीं खुलेआम , आधे तो सरनाम से पता चल जाता था बाकि का पूछ लिया जाता था , बताना ही पड़ता था और कोई भी चारा नहीं बचने का । सारा तामझाम तो उसी से शुरू होना था ये शब्द से सब कुछ तय होता था अगले चार पांच साल का
सफ़र, पहली बार मैंने जाना की मेरे सरनेम और जाती का क्या रिश्ता है , कुछ कुछ ओवरलैपिंग होता था तो confusion होता था। कालेज में घुसते ही ग्रुप मिल जाता था और कहाँ अगला चार पांच साल गुजरना है , पहले से फिक्स , कौन से आपके दोस्त होंगे ये भी ऑलमोस्ट फिक्स। अपना वही हाल हुआ , पहुँचते ही सीनियर ग्रुप मिल गया , कहाँ रहना है , क्या खाना है , बोलना है , नहीं बोलना है , सब उनके हिसाब से , बस जी में जी मिलाते रहे ,
फेज : 1 : पहला
बात शुरू करते हैं पहले कुछ महीने की, शायद ही दुनिया के किसी जगह पे ेऐसा रैगिंग होता होगा। एक बार ये क्लियर हो गया आप किस phylum से हो फिर शुरू होता था टॉर्चेर का दौड़। कुछ विशेष नियम होते थे। …। --जूनियर मुर्गो के लिए (स्पेशल नाम मुर्गा ,फच्चा ,फ्रेशेर )
-- सुबह 6 बजे बजे उठना ,पुरे फॉर्मल ड्रेस में दिन भर , रात के 11 तक
--- नज़र हमेशा थर्ड बटन पर और कॉलर हमेशा बंद
--कॉलेज में इन्सान क्या कुत्तों तक को wish करना , गुड मॉर्निंग ,गुड आफ्टरनून , गुड डे ऐसा आदत पड़ा की आजतक किसी सीनियर को देखते निकल जाता है
-- एक स्पेशल नियम थी " Seniors are always right , if they are not please follow part one "
--Senior का बात नहीँ मानने का मतलब ,mutiny ,rabel और सजा यहाँ बयां नहीं कर सकता बस समझ लीजिये की आधी जान निकाल देते थे
-- आप बड़े बाल नहीं रख सकते , अकेले बाहर नहीं जा सकते , मतलब आप सोने , जांगने ,हसने,बोलने सब सीनियर्स decide करते थे
--हर दिन लगता था की ये extreme है , इससे बढ़कर क्या हो सकता है लेकिन "Sky has no limit "
-- सीनियर रहने पे जूनियर के पैसे खर्च करने का सवाल ही नहीं , सुट्टा ,चाय तो नार्मल ,सिनेमा हॉल से लेकर बस टिकट तक देना होता था
--सीनियर के सारे जर्नल ,कॉपी टेस्ट्स नोट्स अच्छे राइटिंग वाले जूनियर करते थे
रैगिंग लेने का काम सिर्फ Immediate seniors का था , वो बाप होते थे , दादा जी और बड़े दादा जी बहुत कम वो भी एब्नार्मल केस में (pre final year , final year seniors )
रैगिंग ग्रुप और individual दोनों लेवल पे होते थे।
अगर कुछ स्पेशल skill , जैसे , गाना वगैरह हो तो थोड़ा बच सकते थे
Cigarettes ,शराब ये सब बहुत नार्मल बात और मना करने का सवाल ही नहीं होता था
फेज 2 :
फिर आता था दौर फ्रेशेर पार्टी का , अपने यहाँ का रीत जरा सा निराला था , अब रैगिंग हुई phylam के हिसाब से तो पार्टी भी उसी तरह , शहर का कोई होटल बुक होता था , सारे immediate सीनियर्स चंदा करते थे ,और हमारा टाई को ढीला कर दिया जाता था उस दिन। बहुत कुछ तो याद नहीं अलग से मिस्टर फ्रेशेर के सिवा लेकिन हाँ दारू बहुत पीना होता था,और जबरदस्ती का नाच गाना ,
भाई साब डांस भी अजीब , बस नौटंकी कह लो
और अब हम हो गए आजाद पंछी , लेकिन सीनियर इस ऑलवेज करेक्ट वाला बात जिंदगी भर के लिए हो जाती थी , गुड डे सर और गुड मॉर्निंग सर जैसे मानो जबान से चिपक जाती है
पढाई और परीक्षा !
उस दौर में कुछ अजीब से दास्तान हुए थे , बिहार यूनिवर्सिटी में था अपना कॉलेज , लालू का राज था , शिक्षा व्यवस्था की मनो बैंड बज गयी थी , हमारे कॉलेज में एक सिविल के अलावा सारे डिपार्टमेंट्स में टीचर ही नहीं ,सो कॉलेज बस टाइम पास होता था , बस कुछ टीचर अपने क्लासेज लेते थे और बच्चे भी नाम मात्र
सारे परीक्षाएं कॉलेज में ही होती थी ,इंटरनल्स और यूनिवर्सिटी एग्जाम। ये वो दौर था जब इयरली सिस्टम था और साल में दो इंटरनल्स एंड एक यूनिवर्सिटी पेपर्स होते थे।
एग्जाम का स्तर दिन बा दिन गिरता जा रहा था , कोई भी कॉलेज एग्जाम के लिए नहीं पढता था , GATE और PSU का preparation करना मूख्य ध्येय था पढ़ने का
अजीब अजीब नुस्खे होते थे चीटिंग करने के , कहाँ से शुरू करूँ
पहले कहानी शुरू हुयी चिट पुर्जों से , थोड़ी से धाख थी शिक्षकों की , नज़र से बचा के कॉपी कर लिया , कभी सर ने अवॉयड किया तो कभी कुछ देर के लिए कॉपी ले ली।
फिर थोड़ी आगे बढ़ी ,माइक्रो (पूरी किताब का मिनी ज़ेरॉक्स ) छुपकर जाने लगा , अब शायद शिक्षक भी हर मान गए थे , लेकिन थोड़ी सी शर्म बाकि थी लड़कों में , बेचारे टीचर भी क्या करें क्लास भी तो शायद ही ले पाते थे।
एक दो साल में मंजर बदल गया , सरे शर्म और तेल लेने गयी , माइक्रो का खर्च भी ज्यादा लगने लगा और सब को सब कुछ पता ही है, पूरी की पूरी किताब जाने लगी , एग्जाम हॉल में , सवाल ये था की आंसर कहाँ और कैसे मिलेंगे , कितना लिखना है , कहाँ से कहाँ तक , पूरी एग्जाम रूम एक मछली बाजार हो जाता था , आधे घंटे के अंदर सरे स्टूडेंट्स इधेर से उधेर आपने अपने ग्रुप में,
अति तो तब हुयी जब कार्बन कॉपी तक आने लगी ताकि वक़्त बचाया जा सके ,एक सवाल मैं करूँ एक सवाल तू करे ,और फिर अदला बदली कॉपी कार्बन से
ये सब मुख्यतया फाइनल और प्रे फाइनल वाले करते थे , फर्स्ट और सेकंड ईयर वाले अभी भी डरते थे और थोड़ी सी पानी था उनकी आँखों में,
खैर ये सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला , यूनिवर्सिटी में पता चला , बिहार की सरकार बदली , एग्जाम इनटर्नल से एक्सटर्नल हुआ वो भी यूनिवर्सिटी के कॉमन हॉल में अंडर रैपिड एक्शन फ़ोर्स और फिर क्या शमा था। .......... कल तक किताब खोल के नक़ल करने वाले अब सर तक नहीं हिला सकते थे, पाप का घड़ा शायद भर गया , बहुतों को बैक लगा , सबों ने पढ़ना और रटना शुरू कर दिया , सिर्फ यूनिवर्सिटी क्लियर करना है भाई।
जनबरी महीने में आता था GATE का result और कॉलेज के दीवारें रंग जाती थी पोस्टरों से .... congratulation वाले ... समझ में नहीं आता था ये सब पढ़ते कब थे यैसे हालत में एक दो नहीं कई रैंक होल्डर खासकर civil mechanical और electrical में फिर किसी ने Psu निकाल ली वो कहानी चलती रहती थी चाय सुट्टा वाले टपरे पर
टपरे से याद आया ....वैसे वो जगह होती थी जहाँ कॉलेज के सारे नियम कानून ताक पे रख दिए जाते सिवाय सीनियर junior के .... सारे लोग एक ही suttta पीते थे बाँट बाँट के मानक्या प्यार है इन
पूरी तरह से बलात्कार हो जाती थी बेचारी सुट्टे का ,सीधा नियम था जितना मुंडी उतनी चाय
लड़की और कड़की
पूरी तरह से लड़को के कालेज में नाम मात्र की लड़कियां भी पढ़ती थी उन दिनों ,वैसे phylum का कण्ट्रोल थोडा कम रहता था उनपे लेकिन फिर भी वो तो वहां की हवा में था देर सबेर आना ही था ,हाँ एक आधा rabel तो हो ही जाते थे
किसी दूसरी phayle की लड़की को लाइन मारना भी अपराध था और बहुत ही हिम्मत की काम था ,खुलेआम दोस्त होना जुर्म था जब तक की मजबूरी न हो , कालेज के ज्यादातर झगडों के मूल कारन लड़की होती थी मगर ये बात उन्हें पता नहीं होती थी
उन दिनों लड़कियों का हॉस्टल नहीं था और वो दो स्पेशल जगह पे होती थी , white houce और pink houce ,नाम के पीछे की अलग कहानी थी ,लेकिन अच्छी लड़कियां पहले में रहा करती थी ,
लड़कियो के साथ घूमना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी और ये करना सब के बस की बात नहीं थी
मेरे बैच तक जीन्स में आने की हिम्मत नहीं की लड़कियों ने ,बाद में बात सामान्य हो गयी
कड़की का दौर रहता था , सरकारी कॉलेज का फी तो कुछ नहीं था लेकिन ज्यादा लोग लोअर मिडिल क्लास से आते थे ,चाय सुट्टा और स्नैक्स का खर्च भी ग्रुप में डर ही लगता था की मेरे सर न आ जाय. जूनियर आने के बाद तो ये डर भी रहता था की पता नहीं किधर से वो आ टपके , कुछ लोग वहां के लोकल बच्चों को पढ़ाते थे कुछ पैसों के लिए..... हाँ अगर आप रिज़र्व से हो तो फिर मजे हैं आपके , फी माफ़ी के अलावा पैसे भी मिलते थे मटरगस्ती के लिये
लड़ाई और पढाई
लड़ाई झगड़ो का दौर हमेशा रहता था , झगड़ों की कोई खास वजह नई होती थी , बस मौका चाइये हो स्टार्ट हो जाते थे , आपस में लड़ते थे और दूसरे कास्ट से तो लड़ते ही थे , कभी कभी ये झगड़ा मारने मारने तक जाती थी और कॉलेज अनिश्चितकालीन बंद
बहार वाले से झगड़ा होने पे सब एक हो जाते थे लेकिन आगे उन्हें होना होता था जो की लड़ाई स्टार्ट करते थे
हर किसी के पास अश्त्र और शस्त्र होता था ,हॉकी स्टिक, बेसबॉल बैट,लोहे की रोड,चैन देसी मेड कट्टा ये सब फेवरेट ,वैसे हमने हॉकी स्टिक और कुछ सड़े हुए देसी बम के अलावा कुछ प्रयोग होते नहीं देखा
एक झगड़ा मुझे बहुत याद है जहाँ हमने बहुत मारा और शायद बहुत पिटाई खायी ,बिना जाने समझे जा भिड़े बस स्टैंड वालों से ,खैर बात बहुत नई बढ़ी और दो चार लोगों के सर पैर फूटे,थोड़ी सी नौटंकी और बचैनी के बाद मामला रफा दफा हो गया ,लेकिन लगता था दुनियां यही है और हम बस ये ही करने आये हैं
बात अगर पढाई की हो तो भी जबाब नहीं ,बिहार के टॉप लड़के आते थे जाहिर है सब अच्छे ही होते थे पढ़ने में ,आज अगर नज़र घुमा के देखो तो एक आध को छोड़कर सब काफी सफल जिंदगी जी रहे हैं , कुछ बच्चे कॉलेज से ही जॉब ले लेते थे और कुछ कथवारिया जा के , मकसद सिर्फ PSU जॉब लेना होता था ,GATE में अच्छे रैंक और qualify भी अच्छे खासे होते थे ,खुद से पढ़ के इतना भी होना एक करिश्मा ही था , एक सिविल को छोड़कर लगभग सभी लोग खुद से ही पढ़ते थे , कॉलेज में उन दिनों कैंपस बिलकुल नहीं होता था सिर्फ टॉप पांच मेकैनिकल और एलेक्ट्रिक्ल को टाटा मोटर्स में चांस मिलता था , बाकि सब की जिंदगी में वही फाइट , पहले तो चार साल की पढाई पांच साल यहाँ ऊपर जॉब का भी लफड़ा ,फाइनल इयर तो यूँ ही निकल जाता था सबका
जिंदगी के ये चार पांच साल में शायद ही कुछ अच्छा किया हो लेकिन ये सबसे ज्यादा याद आने वाले पल हैं ,मुझे ये नहीं पता की एक इन्सान बनने में दुनिया को बेहतर जानने में ये साल कुछ मदद करता हो लेकिन ये वो मंज़र था जिसे याद करके एक अलग अहसास होता है . पूरी रात बैठ के कोई शराब पी सकता है ,पीने के बाद इतनी उलटी की अपने भी साथ छोड़ दें ,मगर वो कमबख्त दोस्त और पिलाते थे , फ़िर सुबह के चार बजे जा के बेरिया बस स्टैंड में चाय पीना , रोटी तंदूर (RT) जैसा चिकन और स्पंज कहीं नहीं मिला मुझे . संजय सिनेमा का बिना टिकट लिए मूवी देखना और भारत जलपान का डोसा | सारी दुनिया अपनी थी और लगता था हमसे ही जहाँ ,मन करता है हर वो चीजें करो जो करने नहीं आये हो तभी असली मज़ा है जीवन की
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