बुधवार, 8 जनवरी 2014

गाँव और क्रिकेट !!



मेरे गाँव और क्रिकेट  बहुत पुराना नाता है , जब  तक बहुत  बच्चे थे तो चोर नुकइया और राजा कबड्डी खेलते थे,उम्र के साथ वो बेकार लगने लगा.

शुरुआत  में हमें दूध भात खिलाडी  रखा जाता था ,  विकेट कीपर के पीछे गेंद पकड़ने को ,गेंद होती थी कोर्केट वाली ,बहुत चोट लगती थी , शायद  ही कभी  बैटिंग का मौका मिला होगा
खैर वक़्त के साथ  हम थोड़े बड़े हुए और टीम का रेगुलर मेंबर बने , बोलिंग एन्ड बैटिंग दोनों, टूर्नामेंट खेलने जाना दूसरे टोल और बुलाना उन्हें अपने पिच पे , अपने यहाँ हारना शर्म कि बात होती थी
ज्यादा वक़्त हरने के केस में झगड़ा होना ही था
अच्छे खिलाडी थे , मुआरी चाचा ,पंकज ,कारी भैया ,सरोज भैया ,मनोज ,बौना ,फुरफुरिआ ,धनञ्जय और भी बहुत, हमारे मेनेजर होते थे नथुनी चाचा
शाम के ४ बजते ही कठमी गाछ के नीचे वाली पिच में काठ का भारी बैट और कॉकेट कि गेंद , हाथ और पाऊँ बचाना खिलाडी का जिम्मा, पहली बार जब ओरिजिनल बैट आया ,तब जाना कि क्रिकेट कितना आसान है
शायद राघो जी ने दिया था पैसा ,आज भी यद् है  हमें, वो बहुत प्यार करते थे बच्चों से, तभी आज शायद आगे और खुश हैं जिंदगी में।
कभी कभी टूर्नामेंट खेलने जाते थे दुसरे गाव में ,बोरो प्लेयर के साथ खेल नहीं सकते ये शर्त होती थी अपनी और हाँ एक अम्पायर अपना होता था :) ज्यादा टाइम हम हारके ही आते थे मगर क्या मजाल कि भरोसा कम हो जाये।  कोई नियम  नहीं ,कोई रूल नहीं ,lbw का तो नियम ही नहीं था मगर किसी कि क्या हिम्मत कि पैर भी लगाये ,चोट का इतना डर। छ बाल का ओवर होना भी रेयर ही था,करते रहो ,जब कोई टोके तो बोल दो ५ गेंद हुयी , फील्डिंग बस नाम का ही होता था ,अगर कभी किसी ने पकड़ लिया तो बड़ी बात नहीं तो गाछ ही हमारे फील्डर थे।

इस साल जब गाव गया ,तो बहुत खेला बच्चों के साथ ,कुछ तो २०-25 साल छोटे थे  । बहुतों को जनता तक नहीं था ,मेरे दोस्तोँ के बच्चे। एक  जेनेरशन पुराना हो गया हूँ अब।  अब उनके पास अच्छे अच्छे बैट हैं ,टेनिस वाली गेंद हैं ,बदला नहीं है तो गाछी और खेलने वाला पिच , अभी भी गेंद खोती है नाले के गंदे पानी में ,अभी भी गेंद खोती है अरहर के खेत में ,जाती है बाल खरही में और गन्दगी में लेकिन जूनून वही है खेलने का।

आजकल पैसे`पे होने लगा है खेल और सिर्फ बहुत छोटे बच्चे खेलते हैं ,पता नहीं क्यों ,बड़े सिर्फ तास खेलते हैं
एक और बात , उन दिनों टेनिस गेंद नहीं होती थी,और आपको हाथ घुमा कर बोलिंग करनी होती थी , आज कल हर कोई ढेपा फेकता है ,और वही स्टैण्डर्ड हो गया है। खिलाडी वैसे ही हैं बल्कि अच्छा खलते हैं और लड़ाई झगड़ा भी बहुत कम हो गया हैं। बच्चे तैयार हैं बड़ों के साथ खेलने को मगर कोई खेलता ही नहीं।
इतनी जल्दी लोग बड़े क्यों हो जाते हैं। .... सवाल वहीँ है …। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें