शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

कशमकश

दो शक्श है अपने अंदर ,इक वो जो देहात में पला है , वहीँ की मिटटी में खेला है , खुश होता है गाँव की बातें देखकर सुनकर !  इक जो देखा है  शहर को , बड़ी बड़ी किताबें खोलकर ये समझ लिया की यही है असली दुनिया , भाग रहा है दिन रात ये सोचकर की उसे शूकुं मिल जायेगा .  कहाँ जायेगा कुछ पता नहीं बस चले जाओ किसी अनजान साये के पीछे . मगर क्या करें देहात भी बदल गया है ,लोग बदल गए हैं . नए नए यंत्रों ने उन्हें भी दिखा दी है नयी दुनिया .  वहां भी शुरू हो गयी है चूहों वाली दौर . पहले इंजिनियर होना बड़ी बात होती थी , भला हो  नए नए कालेज का , कुछ नहीं तो इंजिनियर तो बन ही जायेगा . शुकून वहां भी नहीं हैं

अक्सर सोचता हूँ मतलब क्या हैं ये सब भागमभाग की तो किसी भद्रजन ने कहा , की जीवन स्तर का सुधार करना ही मुख्या धेय्ये हैं कमाने धमाने का . कुछ देर तो समझा , मगर क्या पैमाना हैं जीवन स्तर मापने का यही पता नहीं . क्या भौतिक सुखो का साधन ही है वो इंडेक्स . शायद नहीं  !!  खुश रहने को ग़ालिब ख्याल अछ्हा है

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